19.11.2015 ►Acharya Shri VidyaSagar Ji Maharaj ke bhakt ►News

Published: 19.11.2015
Updated: 05.01.2017

Update

❖ हजारों लोगों ने की आचार्य संघ की आगवानी ❖ #Exclusive #todayPic #Update #AcharySri #VidyaSagarJi (y) hit a share..

और गुरूवर ने पाद प्रक्षालन करा लिया... संत शिरोमणि जैनाचार्य - विद्यासागर जी महाराज ससंघ जब विहार कर रहे थे, उस दौरान मात्र 4 घर के एक गांव ‘‘पहला‘‘ के एक घर में आचार्य श्री विहार के दौरान बैठ गए तो उस घर के मुखिया ने एक लोटा, ग्लास लेकर ‘‘अतिथि देवो भवः‘‘ की तर्ज पर आचार्य श्री को जल पीने के लिये दिया। लेकिन उस ग्रामीण को यह मालूम नहीं था कि जैन साधु चैबीस घंटे में एक बार आहार के दौरान ही जल ग्रहण करते हैं। तो अन्य साधुओं ने उस ग्रामीण की भावनाओं केा देखते हुए एक थाली बुलाई और उस ग्रामीण से आचार्य श्री का पाद प्रक्षालन करवा लिया। लगभग 5-7 मिनिट तक आचार्य संघ उस घर के आंगन में विश्रामरत रहा।

विहार के दौरान रहली में --। संत शिरोमणि जैनाचार्य विद्यासागर जी महाराज सिंगपुर से विहार करते हुए पटनागंज रहली पहुचे। जहां गुरूवर के दर्शनों के लिये जैन समाज सहित नगर के सभी वर्गों के लोग उमड पडे। गुरूवार को सुबह आचार्य श्री ससंघ सिंगपुर से विहार कर कुसमी, मोकला, सागौनी तिराहा होते हुए चाँदपुर पहुचे। जगह जगह आचार्य संघ की भव्य आगवानी हुई। मुनि सेवा समिति के सदस्य मुकेश जैन ढाना ने बताया कि आचार्य श्री की आहारचर्या चांदपुर में राजकुमार जैन रामा सेठ के परिवार में हुई। उन्होनें अपनी ओर से 4 गाय की राशि शांतिधारा को देने की घोषणा की। बीना बारहा में वर्षाकालीन चातुर्मास के समापन के पश्चात पिच्छिका परिवर्तन समारोह के तीन दिन बाद ही बुधवार को आचार्य संघ का विहार हो गया। आहारचर्या के उपरांत संघ का विहार चक्की, चैका गांव होते हुए पटनागंज रहली में आचार्य श्री का मंगल प्रवेश हुआ। लगभग डेढ-दो किमी तक रांगोली डाली गई। सैंकडों जगह आरती उतारी गई। आचार्य श्री ने पटनागंज के बडे बाबा महावीर स्वामी के मंदिर में पहुचकर ससंघ दर्शन किए। रात्रि विश्राम संत भवन पटनागंज में हुआ। इसके पूर्व जबलपुर चौराहे पर मुनि श्री पवित्र सागर महाराज और मुनि श्री प्रयोग सागर महाराज का आचार्य श्री से 12 वर्षों बाद मिलन हुआ। आचार्य श्री एक झलक पाकर दोनों मुनि महाराज भाव विभोर हो गए। रहली नगर में आचार्य संघ का आठवीं बार पदार्पण हुआ है और 47 वर्ष बाद रहली में आगामी 8 दिसंबर से 14 दिसंबर तक पंचकल्याणक गजरथ महोत्सव का आयोजन हो रहा है।

जनता ठान ले तो उसी गांव से जाते हैं संत: आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ---चांदपुर में आचार्य श्री ने अपने आशीर्वचन में कहा कि चांदपुर में वे पहले तीन बार आ चुके हैं। लेकिन रूकने का सौभाग्य नहीं मिला। आज यहां सौभाग्य जनता के भाग्य से मिला है और आहारचर्या भी पहली बार इस गांव में हुई है। संयोग भी बडी कठिनाई से मिलता है। तेज भाग्य के कारण ऐंसा हुआ है। सिंगपुर से विहार के दौरान मुडेरी गांव में दीवाली जैंसा माहौल देखने को मिला। लोगों ने सडक पर फूल बिछा दिये, रांगोली डाल दी, आरती के दीपक लेकर लोग एक झलक पाने के लिये इधर-उधर हो रहे थे। मुझे लगता है कि इन्ही लोगों का भाग्य था, क्योंकि जो रास्ता अनंतपुरा की ओर जाता था, वह छोडकर इस गांव से निकले। संत कहीं से भी चले जाएं लेकिन जनता ठान ले तो संत जनता के भाग्य से उसी गांव से होकर जाते हैं। ज्यादा पुण्य था इस गांव का। आचार्य श्री ने कहा कि महाराज केवल जैनियों के नहीं थे। सभी लोगों के थे। कुसमी गांव में लोग अड गए कि मेरा पाद प्रक्षालन करना है और वो करके ही माने।

रहली नगर में होगी आहारचर्या---- संत शिरोमणि जैनाचार्य विद्यासागर जी महाराज ससंघ पटनागंज से विहार कर सुबह 8 बजे रहली नगर में प्रवेश करेंगे। धर्मशाला के प्रांगण में आचार्य श्री की पूजन होगी और आहारचर्या भी नगर में होगी।

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नाहं रामो न में वांछा, भोगेश्वपीदमे मनः! शान्तिमास्था तु मिछामी, स्वात्मन्नेव जिनो यथा!!
--- गुरु वशिष्ट से श्री राम योगवाशिष्ट "महारामायण", वैराग्य प्रकरण में कहते है!!

"जिन" शब्द का प्रयोग करते है श्री राम और कहते है हे गुरुवर... मैं वो राम नहीं हूँ जिसको प्रजा राम राम बुलाती है और अब मेरी वांछा भी नहीं, अब मैं मर्यादा पुरुषोतम के सत्कार को, अयोध्या नरेश के सम्मान को, और सारे वैभव को नहीं चाहता, और सांसारिक सुखो में भी मेरा मन नहीं लगता और अब मैं तो अपने ही स्वरुप में रम जाना चाहते हूँ..जिस राम में योगी रमण करते है उसी राम में मैं राम जाना चाहता हूँ...जिस प्रकार जिन अपने भीतर के राम में राम जाते है उसी प्रकार उस शुद्ध आत्मा राम में रम जाना चाहता हूँ [ये जिन शब्द को प्रयोग महर्षि बाल्मीकि ने अपनी रामायण में किया है ]!!

❖ होली उन मुनिराजो को खेलत देखे, अन्तरंग कर्म-होली खेलत देखे,
सम्यक ज्ञान-रंग में उजला-उजला पानी, वीतराग-आनंद में डूबत देखे,

चैतन्य गुफा में बैठे जिन-सम-मुनिवर, अनंत-गुणों संग चारित्र को लेखे,
ध्यान रूपी अग्नि संग ले वात्सल्य की ज्योति, कर्म-इंधन जलाते देखे,

आत्म-आनंद के अक्षय-अमृत में डूबत, कह न पावे वे उल्लासित देखे,
श्रेणी चढ़, जिनेन्द्र झलक उनमे दमके, वीतराग-भाव से फिर वे देखे,

कैलाशी आदि-ब्रम्ह, शंत्रुन्जय में पांडव मुनिवर केवलज्ञान को लेके,
ऐसे वीतरागी-हितोपदेसी को बारम्बार वंदन, उनके शरण आकर तो देखे,

जिनवाणी का मार्गदर्शन, हम खुद लेखनी बन, एक बार तो खुद को लेखे,
अभी तक वीतरागता दूर से निहार, अब एक बार तो जरा चख कर देखे!!

ऐसी होली हम कब खेले, कर्मो की धुल उड़ा उड़ा खेले...

होली / फाग और जैन धर्मं, श्री कृष्ण और नेमिकुमार का फाग....
होली सामाजिक व् सांस्कृतिक व्योहार है, कोई धार्मिक नही, जैसे की हम लोग जानते है होली को 'फाग' के नाम से भी बुलाया जाता है और फाग को कोई विशेष उत्सव पर कभी भी खेला जा सकता है, जैसे बुन्देलखंड में हम लोग शादी के अवसर पर ये खेलते है!
जैसा की जैन ग्रंथो में आया है की भगवान् नेमिनाथ जी जब कुमार अवस्था में थे, और इनके भाई श्री कृष्ण के साथ ये होली खेलते थे, ये गीले रंगों से फाग खेल रहे थे, तो इन लोगो की धोती गीली हो गयी और श्री कृष्ण की पत्नी आयी और श्री कृष्ण की धोती को निचोड़ दिया और जब नेमीकुमार ने बोला मेरी भी नोचोड़ दो तब नेमी कुमार की भाभी मुस्कुराते हुए बोली आप पत्नी ले आओ जो आपकी धोती को सुखाये, तभी श्री कृष्ण ने पूछा नेमिकुमार से शादी के लिए और उन्होंने हां कर दी,
होली दहन के उदाहरण से प्रेरणा मिलती है की हमें भी अग्नि की तपस्या में कर्मो को जलाना है

Holi is more of a cultural festival, rather than any religious one.
Well, holi is also called as "Faag" and faag can be played (means putting colours on each other) at other occasions too. In Bundelkhand, we used to play with colours till much recently at the time of marriages.

Lord Neminathji, when he was a prince and was cousin of the hindu God Krishna, played faag with Krishna- this is mentioned in Jain texts.And, the story says that they played with wet colours and so their dhotis (clothes) got soaked in water with clours.Then Krishna's wife Rukmani came and squeezed the dhoti of Krishna.When NemiKumarji asked the same for himself to his 'Bhabhi' that is Rukmani, she smiled and asked him to bring a wife for himself so that she can dry up his dhoti.
At, this Krishna also asked him to marry and to this proposal Nemikumar said "Yes"........!!!

Many a times the burning of Holi is taken as an example to explain that we have to burn our karmas in the fire of Penances or tapas.

Also, in our bhajans we do say that we are playing with colours and specially the saffron one which is the colour of joy, happiness and beginning of the spirituality as per our traditions.

"Laal rang daaro
Gulaabi rang daaro
aur rang daaro Kesariyaa
hum toh 'Prabhuji' ke baawariyaa........!!!

Ek boond daaro
ki do boond daaro
chaahey udhero gaagariya
hum toh prabhuji ke baawariya.........!!!"

Written by - Dr Amit Prakash Jain [Thank You]

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Update

❖ कर्मों की होली --- मुनिराज पेड के नीचे बेठे थे! ध्यानमग्न! कर्मो की होली जला रहे थे! दो श्रावक वहाँ से निकले! तीर्थंकर प्रभु के समवशरण मे जा रहे थे! वो समवशरण मे जाते ही भगवान से पूछते हैं! भगवन! हमारे नगर के राजा ने मुनि दीक्षा ग्रहण की है और वे पेड के नीचे बेठे ध्यान कर रहे है! उनके संसार मे कितने भव शेष हैं?

तीर्थंकर प्रभु की वाणी मे आया - उनके संसार मे इतने भव शेष हैं जितने उस पेड मे पत्ते!
श्रावक -प्रभु! वो तो इमली के पेड के नीचे बैठे हैं! इमली के पेड के पत्ते गिने जा सकते हैं क्या?
भगवन ने कहा -हाँ उतने ही भव शेष हैं
श्रावको ने पूछा -और भगवन हमारे?
भगवन -तुम्हारे केवल सात व आठ भव शेष हैं!

वे श्रावक क्या थे कि बस अहंकार मे फूल गए कि मुनि के इतने भव शेष हैं जितने इमली के पेड मे पत्ते व हमारे केवल सात व आठ!
सम्यक्दर्शन का अभाव था! मुनि के पास आये और आते ही कहा! अरे पाखंडी घर बार छोड़ कर किसलिए तपस्या मे लगे हो,तुम्हे अभी संसार मे इतना भटकना है,इतने भव धारण करने हैं जितने इस इमली के पेड मे पत्ते!

मुनिराज मुस्कुराए -सोचते हैं तीर्थंकर प्रभु की वाणी मिथ्या तो हो नही सकती! कम से कम इतना प्रमाण तो मिल ही गया कि मुझे केवलज्ञान होगा! मोक्ष सुख की प्राप्ति होगी! मुनिराज ने समाधिमरण किया व पहले का निगोद आयु का बंध किया हुआ था सो निगोद मे चले गए! और निगोद मे एक भव कितने समय का? एक श्वांस मे अठरह भव होते हैं,निगोद मे इमली के पत्तों के बराबर भव काटने हैं! एक सप्ताह के अंदर निगोद मे गए भी और वापस भी आ गए! निगोद से निकलकर उसी नगर मे मनुष्य भव धारण किया अर्थात आठ वर्ष अंतरमुहूर्त के बाद फिर मुनि गए और बैठ गए ध्यान मग्न उसी इमली के पेड के नीचे! एक अंतर मुहूर्त अगले मनुष्य भव का,आठ दिन निगोद आयु के व आठ वर्ष बालक अवस्था के! वही श्रावक फिर उसी रास्ते से तीर्थंकर प्रभु के दर्शन को गुजरे! समवशरण मे पहुँच कर प्रभु से वही सवाल!

भगवन कहते हैं -आठ वर्ष पहले जो मुनिराज वहाँ तप कर रहे थे,ये मुनिराज उसी मुनि का जीव है जो निगोद मे अपनी बंध की हुई आयु पूरी करके फिर से मनुष्य भव मे आकर तप कर रहे हैं और जब तक तुम वहाँ वापस पहुंचोगे उन्हें केवल ज्ञान की प्राप्ति हो चुकी होगी!
ओह धिक्कार है हमारे इस जीवन को अभी हमें सात आठ भव मे न जाने कितना काल इस पृथ्वी पर बिताना है और धन्य है उन मुनिराज का जीवन जो हमारे जीते जी ही केवल ज्ञान को प्राप्त हो गए!

हम अहंकार मे रहते हैं कि मै मनुष्य हूँ और चींटी को रोंद देते हो पैरों से! ध्यान रखना चींटी हमसे व तुमसे पहले मोक्ष जा सकती है अगर मरकर विदेह क्षेत्र का मनुष्य योनि का पहले बंध किया हुआ होगा!

मुनि श्री 108 सुधासागर जी महाराज "दस धर्म सुधा " मे http://www.teerthankar.blogspot.in

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News in Hindi

❖ हस्तिनापुर मंदिर का Interesting इतिहास!!

कई राजनीतिक और प्रकृति कारणों से हस्तिनापुर मध्यकाल के पश्चात् शताब्दियों तक उपेक्षित रहा. इसी उपेक्षा परिणामस्वरूप लगता है. यहाँ के प्राचीन मंदिर और निष्धिकाएं नष्ट हो गयी. किन्तु तीर्थ स्थान तो यह बराबर बना रहा और भक्त लोग यात्रा के लिए आते रहे. 18-19 वी शताब्दी में यहाँ मंदिर और निशियों की हालत बड़ी जीर्ण-शीर्ण थी. सभी लोगो की इच्छा थी कि यहाँ मंदिर अवश्य बनना चाहिए. लोगो कि प्राथना पर सं. 1858 (सन 1801) ज्येष्ठ वादी 13 के मेले में दिल्ली निवासी राजा हरसुख राय जो मुग़ल बादशाह शाह आलम के खजांची थे, उन्होंने मंदिर के लिए अपनी स्वीकृति दे दी.

दूसरे दिन राजा हरसुखराय, लाला जयकुमारमल और सैकड़ो जैन व्यक्तियों की उपस्थिति में राजा नैनसिंग ने धरातल से चालीस फीट ऊंचे टीले पर दिगम्बर जैन मंदिर की नीव में अपने हाथों से पाँच ईंटे रखी. इसके बाद राजा हरसुखराय के धन से लाला जयकुमार की देख-रेख में पांच वर्ष में विशाल शिकरबंद दिगम्बर जैन मंदिर का निर्माण हुआ. कहते हैं, जब कलशरोहाण और वेदी-प्रतिष्ठा का अवसर आया तो राजा हरसुखराय ने पंचायत में प्राथना की - पंच सरदारों! मेरी जितनी शक्ति थी, मैंने उतना कर दिया, मंदिर आप सबका है अत आप लोग भी इसके लिए सहायता करें. उस समय जो लोग वहां उपस्थिति थे, उनके सामने घड़े में दाना डाला गया, किन्तु फिर भी यह राशि अत्यंत अल्प थी. मंदिर निर्मित सभी जैन भाइयों से इस तरह एकत्रित करने में राजा साहब का उददेश्य मंदिर को सार्वजनिक बनाना और अपने को अहंभाव से दूर रखना था.

ततपश्चात सम्वत 1813 में कलशरोहण और वेदी-प्रतिष्ठा का कार्य राजा साहब ने समारोह-पूर्वक कराया. उस समय मंदिर में दिल्ली से लायी हुई भगवान पार्श्वनाथ जी की बिना फणवाली प्रतिमा विराजमान की गयी. वि.स. 1817 में लाला जयकुमारमल ने मंदिर का विशाल सिंह द्वार बनवाया.

इस मंदिर के चारों ओर धर्मशाला बनाई गयी(यह सभी जिन मंदिरों से रूप में परिवर्तित हैं). मंदिर के बाहर की कई दिगम्बर जैन धर्मशालाए बनी हुई हैं. मंदिर में बहुत सा काम राजा हरसुखराय के पुत्र राजा शुगनचंद जैन ने कराया था. इन्हीं के वंशज धर्मं परायण, मुस्कराहटों के धनी एव समाज के लिए समर्पित लाला त्रिलोकचंद जी जैन - भारत नगर दिल्ली निवासी, क्षेत्र कमेटी के अध्यक्ष पद को शोभायमान कर रहे है.

पौराणिक ओर ऐतिहासिक ओर सांस्कृतिक नगरों में की जाती है. मानव विकास के आदिकाल से ही यह राजनितिक, सांस्कृतिक ओर आध्यात्मिक घटनाओं की लीला भूमि रही है. आदि तीर्थकर भगवान ऋशभदेव ने 52 आर्य देशों की स्थापना की थी. उनमें कुरु जांगल देश भी था. इस प्रदेश की राजधानी का नाम गजपुर था. संभवत इस प्रदेश के गंगा तटवर्ती जंगल में हाथियों का बाहुल्य हने के कारण यह गजपुर कहलाने लगा. इसके पश्चात कुरुवंश में 'हस्तिन' यह गजपुर कहलाने लगा. इसके पश्चात कुरुवंश में 'हस्तिन' नाम का एक प्रतापी राजा हुआ. उसके नाम पर इसका नाम हस्तिनापुर हो गया. प्राचीन साहित्य में इस नगर के कई नाम आते हैं. जैसे- गजपुर, हस्तिनापुर, गज सहव्यपुर, नागपुर आस्न्दीवत, ब्रहास्थल, "शांतिनगर" कुंजरपुर आदि.

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❖ इक्कीसवी शताब्दी का धर्मं - जैन धर्मं * मुजफ्फर हुसैन!! [ एक मुस्लिम चिन्तक की द्रष्टि से जैन धर्मं का महात्म्य और उसमे निहित असीम संभावनाए - संपादन ] ❖

---> 21वी शताब्दी का धर्मं 'जैन धर्मं' होगा! इसकी कल्पना किसी सामान्य आदमी ने नहीं की है, बल्कि 'बनार्ड शो' ने कहा कि यही मेरा दूसरा जन्म हो तो मैं जैन धर्मं में पैदा होना चाहता हूँ, ये बात स्वयं 'बनार्ड शो' ने गाँधी जी के पुत्र देवदास गाँधी से कही थी!

---> रेवेरेंड तो यहाँ तक कहते है कि दुनिया का पहला मजहब जैन था और अंतिम मजहब भी जैन होगा!

---> बाल्टीमोर [USA] के दार्शिनिक डॉक्टर मोराइस का कहना है कि यही जैन धर्म को दुनिया ने अपनाया होता तो यह दुनिया बड़ी खुबसूरत होती!

---> जस्टिस रानाडे ने कहा कि ऋषभदेव, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ और महावीर, ये चार तीर्थंकर नहीं बल्कि जीवन और चिंतन कि चार दिशाए है!

ऐसा जैन धर्मं में क्या है? जैन धर्मं सिर्फ धर्म नहीं, जीवन जीने का दर्शन है, सरल भाषा में कहू तो यह खुला विश्वविद्यालय है! आपको जीवन का जो पहलु चाहिए वो यहाँ मिल जायेगा! दर्शन ही नहीं बल्कि संस्कृति, कला, संगीत और भाषा का यह संगम है! जैन तीर्थंकरो ने संस्कृत को न अपनाकर जनभाषा प्राकृत को अपनाया, क्योकि वे जैनदर्शन को विद्वानों तक सीमित नहीं रखना चाहते थे! वह तो सामान्य आदमी तक पहुचे और उसके जीवन का कल्याण करे, यह चिंतन था!

दुनिया के सभी धर्मो ने अपने चिन्ह किये, इनमे कुछ हथियार के रूप में, तो कुछ आकाश में चमकने वाले चाँद और सूरज के रूप में! २४ तीर्थंकरो में एक भी ऐसा नहीं दिखलाई पड़ता जिसके पास धनुष-बाण हो या फिर गदा अथवा त्रिशूल हो! हथियारों से लेस दुनिया के रजा अपनी शानो-शोकत से अपना दबदबा बनाये रखने में अपनी महानता समझते थे, लेकिन यहाँ तो भोले-भाले पशु-पक्षी अथवा जलचर प्राणी उनके साथ है, उनका कहना था हम साथ साथ जियेंगे और इस दुनिया को हथियार रहित बनायेंगे! इन्सान ने सुविधा के लिए घोड़े, हाथी, गरुड़, मोर और न जाने किन किन प्राणियों को अपनी सवारी बना ली! लेकिन जैन तीर्थंकर तो किसी को कष्ट नहीं देना चाहता है, वे अपने पाँव के बल पर साड़ी दुनिया को उगालते है और प्रकृति के भीड़ को जानने कि कोशिश करते है! रहने को घर नहीं, खाने कोई स्थायी व्यवस्था नहीं, लेकिन दुनिया के कष्टों का निवारण करने के लिए अपनी साधना में कमी नहीं आने देते!

दुनिया में असंख्य वाद है, जो भिन्न भिन्न विचारधारा पर अपना चिंतन करते है, ये विचार से समाज बनाते है, लेकिन जैन धर्मं समाज को व्यक्ति में देखता है, हर वाद ने व्यक्ति को छोटा कर दिया, लेकिन हम देखते है जैन विचार ने मनुष्य को सबसे महान बना दिया, किसी भी हालत में वह व्यक्ति की गुण और उसके सामर्थ्य को समाप्त नहीं होने देता, दुनिया के अन्य धर्म मनुष्य को सामाजिक प्राणी बनाकर उसे जीवन यापन करने केलिए लाचार बना देते है, लेकिन यहाँ तो मनुष्य को अपनी स्वतंत्रता सर्वोपरि है, वास्तव में तो यही स्थिति उसे 'अहं ब्रह्मास्मि' की ऊचाईयो तक पहुचाती है, आदमी से समाज बने तो क्या बड़ी बात है, इंसान को वह भगवान् ही नहीं, बल्कि इस समस्त दुनिया का रचयिता बनाने की बात करता है, इंसान का बनाया कंप्यूटर अपग्रेड हो सकता है तो फिर इंसान क्यों नहीं? चाँद-सितारों को छुने वाला इंसान जब भगवान् बन जायेगा तो फिर क्या उस समय अपनी सीमा में उसे बाँध सकेगा? वह 21वी शताब्दी की नहीं बल्कि इस अजर और अमर दुनिया का प्रणेता बन जायेगा!

आज हिंसा के प्रतिक है - ओसामा, ओबामा और अमेरिका! इन तीनो 'अ' को पराजित करने वाला है जैन दर्शन अपनी झोली में एक संजीवनी को संजोये हुए है जिसका नाम है अहिंसा, अनेकान्तवाद और अपरिग्रह! तीनो एक-दुसरे से जुड़े हुए हिया, ये अलग नहीं हो सकते, चन्द्रगुप्त, अशोक और हर्षवर्धन उस खून-खराबे को नहीं देख सके इसलिए तो फिर उन्होंने कसम खाई की वे अब युद्ध नहीं करेंगे! रावण से युद्ध करने वाले राम ने कहा, अ अयुद्ध चाहिए और अयोध्या को बसा लिया! एक क्षत्रिय कहता है अब वध नहीं होगा तभी तो उसका सामाज्य अवध के नाम से प्रसिद्ध हो गया, हर लड़ाई के बाद इंसान शांति की तलाश में चलने को मजबूर हो गया! पहला विश्व युद्ध समाप्त हुआ तो ईसा के मानने वालो ने लीग लोग नेशन बनायीं! लेकिन फिर भी द्वितीय विश्वयुद्ध की महाज्वाला भड़की को राष्ट्रसंघ बन गया! हर युद्ध के बाद अयुद्ध और हर हिंसा के बाद अहिंसा, यह इंसान की खोज रही है! एटम बम डालने वाले जनरल इश्वर को पता लगा कि हिरोशिमा और नागासाकी में क्या किया, तब उसे भारत कि याद आई और अपनी माँ से कहने लगा - मुझे कोई श्वेत वस्त्रधारी महाराज के पास ले चल, मुझे वहा शांति मिलेगी क्योंकि उसने पढ़ा था कि भारत को न जेट सकने वाला सिकंदर जब लोट रहा था तो उसे एक जैन साधू ने कहा था: "दुनिया को जीतने वाले काश!! तुम अपने आपको जीत सकते!" जैन साधू को सिकंदर अपने साथ ले गया! जैन साधू सिकंदर के बाद में एंथैस में वर्सो तक लोगो को अहिंसा का सन्देश देता रहा! एंथैस से सब कुछ बदल गया, लेकिन आज भी वहा जैन साधू कि प्रतिमा लगी हुई है, प्लेटो और एरिस्टोटल का एंथैस इतना प्रभावित हुआ कि "पैथागोरस जैसा गणितज्ञ कहने वाला कि मैं जैन हो गया हूँ!"

21वी शताब्दी पानी के संकट कि शताब्दी है! जैन मुनि तो कम पानी पीकर अपना काम चला लेते है, लेकिन हम जैन लोग क्या करेंगे? उसका मूल मन्त्र है शाकाहार जो शांति, क्रांति हार्द और रक्षा को परिभाषित करता है! मांसाहार के लिए हाईब्रिड बकरे, डुक्कर और मुर्गिया पैदा कि जा रही है! इन कृत्रिम पधुओ पर अध्ययन करे तो एक बकरी का बचा यदि एक केलो है तो उसे दो किलो बनाने में 5,000 गैलन पानी लगता, लेकिन एक किलो टमाटर को पैदा करने केलिए चाहिए सिर्फ 160 लीटर पानी! भारी जल संकट के समय आप क्या करेंगे?

भूकंप, ज्वालामुखी और सुनामी अब हमारे भाग्य बन गए है! जानवरों के क़त्ल के कारन यह विपदाए आती है! यदि विश्वास न आये तो 'बिसालॉजी' का अध्ययन जरुर कीजिये, जिसका अर्थ वह ज्ञान-शाखा है, जो breakdown of integrate system - समन्वित व्यवस्थाओ के विभाग अर्थात टूटने के कारन कि खोज करती है! बीस सिद्धांत पहले डॉक्टर बजाज, इब्राहिम और सिंह के प्रथम रोमन अक्षरों से बना एक संक्षिप्त शब्द था, किन्तु अब यह एक नयी विज्ञान शाखा के रूप में विकसित हो गया है, एक संकट से उबारने वाला धर्मं ही केवल 21वी शताब्दी का धर्मं बन सकता है!

ये Article मुझे एक Printed-page पर मिला, गजब है...तो मैंने typing करके आप लोगो तक शेयर कर दिया.. -Nipun Jain

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