20.11.2015 ►Acharya Shri VidyaSagar Ji Maharaj ke bhakt ►News

Posted: 20.11.2015
Updated on: 05.01.2017

Update

❖ Scientists accept it-self that still science is not reached to ultimate truth. Today’s sciences on the way discover of ultimate truth but didn’t reach yet. Science is just on-going process when new discovery come old one get down.

Einstein says “we can only know the relative truth, the real truth is known only to the universal observer.” Who can be universal observer in the view of Einstein… “Universal observer of Einstein is non else but the Almighty [Sarvajna Deva] with infinite powers of knowledge and bliss.”

Great Scientist Newton says "We are beginning to appreciate better, and more thoroughly, how great is the range of our ignorance."

Another place he written "Scientific theories arise, develop and perish they have their span of life with it successes and triumphs only to give way later to new ideas and a new out look."

Another scientist says "Things are not what they seem - Science in not in contact with ultimate reality."

Sir Olivr Lodge says "The time will assuredly come when these anemones into unknown region will be explored by science. The universe is a more spiritual entity that we thought. The real fact is that we are in the midst of a spiritual world which dominates the material."
All the worldly soul in the web of karmic bondage just like silkworm only. Silkworm makes saliva to save himself but he fall in coat of the saliva. Just due to saliva of silkworm, he dies by workman for making cloth. Until silkworms don’t create saliva, workman can’t die to silkworm. Same theory applies here with souls, if all the souls don't do attachment/aversion; Karmic particles won’t cleave to soul. --- Once i heard this example by Acarya Sri Vidyasagara G's preaching.

Paul Dundas explains - For the Jain...Mahavira is merely one of a chain of teachers who all communicate the same truths in broadly similar ways and his biography, rather than being discrete, has to be treated as part of the larger totality of the Universal history and as meshing, through the continuing dynamic of rebirth, with the lives of other participaints within it.

Source > Jainism - An Introduction [Copyright @ Jeffery D Long]

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❖ रविवार को पार्श्वनाथ भगवान की पूजा, सोमवार और उन भगवान् की पूजा, क्या जाने क्या क्या दिन रखकर भगवान् का भी दिन निश्चित कर दिया, अगर जीवन में कोई संकट है तो वो निष्काम/विशुद्ध भक्ति से उन कर्मो का प्रभाव कम होगा और अगर आप रविवार को पार्श्वनाथ भगवान की पूजा करते हो तो हम संकट काटने के लिए पूजा कर रहे है जबकि भगवान् की पूजा संकट से बचने के लिए नहीं बल्कि संकट में हमें शक्ति मिले उन कर्मो को सहने की!

हर कोई ग्रहों के चक्कर में पड़ा है, ग्रहों की पूजा करने से कुछ नहीं होता, ग्रहों का अस्तित्व है लेकिन ग्रहों से हमारे जीवन के बारे में पता चल सकता है आने वाले किसी कर्म के बारे में जान सकते है, लेकिन उनकी पूजा से कुछ नहीं होने वाला है, ये बात ध्यान रखना, अभी एक कालसर्पयोग नाम की विधान शुरू हो गया है और खूब विधान पूजा ग्रहों की और इस कालसर्पयोग की हो रही है..जबकि प्राचीन ग्रंथो में कही भी इस कालसर्प योग का वर्णन नहीं है...विश्व की कुछ नामचीन व्यक्तित्व के कालसर्पयोग है जैसे धीरूभाई अम्बानी, सचिन तेंदुलकर!

पूजा के विनय पाठ में क्या पढ़ते हो? राग सहित जग में रुल्यो, मिले सरागी देव, वीतराग भेट्यो अभे मेटो राग कुदेव, और पूजा धर्नेंद्र, पद्मावती आदि रागी द्वेषी की, और तो और अब तो विधान, पूजा होने वाले...कालसर्पयोग में केवल देवी देवताओ की पूजा है और कुछ नहीं...

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❖ चीन और क्रूरता, नृशंसता एक दूसरे का पर्याय हैं। आपको यह सुनकर हैरत हो रही होगी लेकिन सच यही है।

चीन में नकली 'अग' जूते बनाने के लिए रेकान कुत्तों (विशेष प्रजाति के कुत्ते जो चीन मे पाये जाते हैं) का बेरहमी से इस्तेमाल करने का खुलासा हुआ है। चीनी अग जूते बनाने के लिए रेकान कुत्तों को बुरी तरह पीटते हैं फिर जिंदा कुत्तों से बेरहमी से खाल निकाल लेते हैं।
इस घटनाक्रम से जुड़ा एक वीडियो पशुअधिकारों के लिए सक्रिय कार्यकर्ताओं ने एक वीडियो फिल्माया है। जो इस समय वेब पर सुर्खियों में बना हुआ है।

चीनी जीवित रेकान प्रजाति के कुत्तों से खाल निकालने के बाद फेंक देते हैं। फिर कुछ घंटों पर दर्द से तड़पते इन बेजुबानों की वीभत्स मौत हो जाती है।

ओरिजनल अग बूट्स आस्ट्रेलिया में शीपस्किन से मानवीय तरीके से बनते हैं लेकिन इनकी कीमत 250 डॉलर के आस-पास होती है। जबकि चीन में बने नकली अग जूते सस्ते होते हैं। विशेषकर यूके में ये जूते छाए हुए हैं।

ह्यूमन सोसाइटी इंटरनेशनल द्वारा की गई जांच के बाद डायरेक्टर वेरना सिंपसन ने बताया कि आस्ट्रलियन अग जूतों जैसे रैकॉन कुत्तों की खाल से बने अग जूते मिले हैं।

नकली माल बनाने और दुनिया के बजारों में उसे डंप करने के लिए चीन कुख्यात है लेकिन उसका इतना वीभत्स चेहरा होगा उम्मीद नहीं थी। पशुओं के संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सार्थक पहल की आवश्यकता है ताकि इन बेजुबानों को आवाज मिल सके।

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निःसहि का प्रयोग जब हम मंदिर में प्रवेश करते है तो उनसे निवेदन रूप में व् आज्ञा मांगते है की हमें भी दर्शन के लिए रास्ता दे और इस मार्ग से आने की आज्ञा दे....ये तो मंदिर में प्रवेश करते हुए बोला जाता है, अब एक बात जो प्रवचन में महाराज जी ने बताई थी "अगर कभी जंगल में किसी वृक्ष के नीचे बैठना हो या रुकना हो तो निःसहि शब्द का प्रयोग करके बैठ सकते है जिससे उस पर रहने वाले देव से आज्ञा व् निवेदन हो जायेगा...जैसे अगर कोई तुम्हारे घर पर बिना बुलाये आजाये और तुम्हारे घर रुक जाये तो तुमको कितना बुरा लगता है...और अगर पुछ कर आये तो अच्छा लगेगा...वही बात यहाँ पर भी है..." और अ:सहि का मतलब वे देवता लोग अपना स्थान वापस लेले.... "विशेष बात --- जब मंदिर में कोई न हो या भीड़ बहुत कम हो तब तो जरुर ही अच्छे से...इस तरह बोलना चाहिए की कम से कम आपकी आवाज सुने मतलब सिर्फ मन में ही न पढ़े.."

मंदिर में घंटा --- मंगल ध्वनी रूप में बजाया जाता है, घंटे को हलके हाथो से तीन बार बजाया जाता है और घंटे के एकदम नीचे खड़े होकर बजाना चाहिए और घंटा बजाने के बाद उसकी जो ध्वनी गूंजती है उस कुछ सेकंड के समय में घंटे के नीचे ही रुकना चाहिए घंटा बजाते ही नहीं निकल जाना चाहिए...घंटे से कुछ विशेष तरंगे निकलती है जो हमारे सर के उपर वाले हिस्से से अन्दर प्रवेश करती है...जो मानसिक प्रदुषण को ख़त्म करती, और वो ध्वनी depression इत्यादि समस्या में बहुत लाभ दायक है....घंटे की आवाज से पर्यावरण भी शुद्ध होता है, लाल मंदिर, दिल्ली में शोकेस में एक बहुत बड़ा घंटी रखा है, उसमे बहुत अद्भुत मन्त्र लिखे है...विघ्यानिक अनुसंधान से ये बात भी पता चली की शंख और घंटे की आवाज से बहुत से रोगों के कीटाणु भी नष्ट हो जाते है....इत्यादि..

News in Hindi

श्री 1008 संकटहर पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, जैनगिरी, जटवाडा, Spiritual Pilgrimage!

महाराष्ट्र प्रान्त में औरंगाबाद शहर के उत्तरी में हर्सूल जेल से 9 की. मी. की दूरीपर सह्याद्री के पहाड़ी के पास बसे हुए जटवाडा क्षेत्र का इतिहास बड़ा ही मनोरम्य हैं | आजसे करीब 24 वर्ष पूर्व 27 अगस्त 1987 को जो यह क्षेत्र सबके सामने आया वह सैंकड़ो वर्षो से विद्यमान था |

आज से करीब 600 वर्ष पूर्व जब दिल्ली से मुस्लिम बादशाह महम्मद तुग़लक दौलताबाद आया था, तब उसके साथ जैन अग्रवाल व्यापारी भाई अपने परिवार साथ व्यापार करने हेतु आये थे | यह व्यापारी भाई दौलताबाद परिसर के आजू बाजू में व्यापार करने लगे | उसी समय यह समाज जटवाडा क्षेत्र में बस गया | यहाँ जैनियों की बस्ती ज्यादा संख्या में रहने के कारण अनेको मंदिर स्थित थे | इन मंदिरों में सेंकडो की संख्या में मूर्तियाँ थी | पुरातत्व विभाग के इतिहास में देखा जाए तो इस गाँव का नाम जैनवाडा था, जो आगे जाकर अपभ्रंश होकर जटवाडा हो गया |

कुछ कारणवश बादशाह महम्मद तुग़लक दौलताबाद से फिर दिल्ली चला गया | इसी कारण यहाँ के अग्रवाल दिगंबर जैन भाई को व्यापार करने हेतु गाँव छोड़कर नजदीक पास के गाँव में जाना पड़ा | मंदिर में के प्रतिष्ठित वीतराग भगवान के प्रतिमाओं का अविनय न हो इसलिए उन्हें सुरक्षित स्थान पर विराजित (तलघर) किया गया |

आज से ४५ वर्ष पूर्व औरंगाबाद निवासी श्री पुन्जालालसा साहूजी की धर्मपत्नी सौ. सोनाबाई को एक दिन स्वप्न हुआ | स्वप्न में दिखा एक प्राचीन भव्य जिन मंदिर जिनमे अनेक मूर्तियाँ सुशोभित हो रही थी | स्वप्न की बात पति से कही | बात की सच्चाई जानने के लिए औरंगाबाद शहर के आस पास के गाँव में खोजबीन की गयी | जैसा सपने में देखा, वैसा ही मंदिर एवं द्वार पाया जटवाडा में | मंदिर के द्वार पर ही एक वीतराग जिन प्रतिमा उत्कीर्ण थी, इससे स्पष्ट हुआ की यही वह मंदिर हैं | आचार्य तीर्थरक्षा शिरोमणि श्री आर्यनंदीजी महाराज इस समय आसपास विहार कर रहे थे | उन्हें उपरोक्त घटना का पता चला और जटवाडा पहुँच गए | जब मंदिर के अन्दर देखा तो वेदी के निचे भुयार दिखा, जिसमें भ. पद्मप्रभुजी की सुन्दर प्रतिमा (पाषाणकी) मिली | उस समय एलोरा गुरुकुल के अध्यापक ब्र. रामचन्द्रजी बाकलीवाल थे | (जो आगे मुनि श्री जयभद्रजी महाराज के नाम से जानने लगे) यह समय अप्रैल 1967 का था |

आगे आचार्य श्री 108 महावीरकिर्तिजी महाराज अपने विहार दौरान जटवाडा पहुंचे | तब उन्होंने उसी समाय कहा था, यहाँ जमीनध्वस्त मंदिर एवं मूर्तियाँ हैं जो निकलनेपर यह क्षेत्र भारतीय तीर्थक्षेत्र के प्रसिधी पर आकर रहेगा | इस बात की पुष्टि मूर्तियाँ प्राप्त होने के पश्चात आचार्य श्री आर्यनंदीजी महाराज ने भी की थी |

अप्रैल 1967 पश्चात इस मंदिर की व्यवस्था याने भ. पद्मप्रभुजी की नित्य नियम से अभिषेक पूजा सौ. सोनाबाई पूंजासा साहूजी ने संभाली | सोनाबाई के सपनेमे बारबार भुयार मंदिर एवं मुर्तिया प्रगट होती थी | लेकिन स्थान नहीं मिल रहा था | लेकिन एक भव्य तपस्वी दिगंबर साधू की वाणी असत्य कैसे होती?

ता. २८ अगस्त १९८७ को शेख नूर जटवाडा नामक एक मुस्लिम व्यक्ति अपने घर की नीव के लिए पत्थर निकाल रहा था | पत्थर जैसे निकालने लगा, तो वह पत्थर जमीन में धसता चला गया | लोगों को आश्चर्य हुआ | उन्होंने अन्दर झाककर देखा तो एक भुयार था | लोग भुयार में गए तो सभी आश्चर्य से तथा ख़ुशी से उछल गए, क्योंकि अन्दर विशाल २१ प्रतिमाएं विराजमान थी | सौ सोनाबाई के खुशियों का ठिकाना नहीं रहा | अपना सपना जो सच हो गया | यह पुनीत दिन था, भाद्रपद शुक्ल पंचमी, पर्युषण पर्व का प्रथम दिन | यह सूचना औरंगाबाद के जैन भाइयों को दी गयी | जटवाडा में जैन भाइयों की यात्रा उमड़ पड़ी | एक ट्रस्ट कायम किया गया | उस समय के स्थानिक विधायक अम्मानुल्ला मोतीवाला के प्रयास से यह प्रतिमाएं ट्रस्ट को शासन द्वारा प्राप्त हुई एवं जिन मंदिर के वेदी पर रख कर पूजा अभिषेक की विधि शुरू हो गयी | सभी मूर्तियाँ प्रतिष्ठापित की हुई एवं उसपर शिलालेख लिखा हुआ था | सभी प्रतिमाएं 15, 16 एवं 17 वे शताब्दी की हैं | आगे सभी मुर्तिया चमत्कृत सिद्ध हुई | एक नागराज यहाँ हमेशा अष्टमी, चतुर्दशी, पौर्णिमा एवं इतवार आदि शुभदिन आकर दर्शन कर अदृश्य हो जाता हैं | यही मंदिर आगे श्री १००८ संकटहर पार्श्वनाथ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र, जैनगिरी जटवाडा के नामसे प्रसिद्ध हुआ |

फरवरी1194 में ज्ञानयोगी प्रज्ञाश्रमण आचार्य श्री देवनंदीजी महाराज क्षेत्र पर दर्शनार्थ आये तब ११ दिन तक उनका यहाँ वास्तव्य रहा | उन्होंने क्षेत्रोद्धार की प्रेरणा दी तथा वेदिशुद्धि का समारोह सम्पन्न हुआ | आचार्य श्री देवनंदीजी महाराज की पवन प्रेरणा एवं मंगल आशीर्वाद से ट्रस्ट एवं सभी समाजने क्षेत्रोद्धार करने का निश्चय किया | देखते देखते क्षेत्र पर मंदिर जीर्णोद्धार का कार्य, कार्यालय, महाद्वार, मुनिनिवास, भोजनशाला, अतिथिनिवास में ३३ कमरोंकी सुविधा, 2 बड़े हॉल, बारा हजार स्व्के. फूट का आचार्य देवनंदी हॉल, तीन मूर्ति एवं चोबिसी की स्थापना, मंदिर का अद्वितीय शिखर, अप्रतिम मानस्तंभ, धर्मशाला महाद्वार एवं पहाड़ीपर भ. बाहुबली की प्रतिमा की स्थापना आदि कार्य सम्पन्न हुए | क्षेत्र पर आज तक सेंकडो दिगंबर जैन आचार्य, मुनि आर्यिकाओंका आवागमन रहा | क्षेत्र पर प्रति वर्ष भगवान पार्श्वनाथजी के जन्म कल्याणक दिन पर वार्षिक यात्रा का आयोजन होता हैं | मूलनायक श्री 1008 संकटहर पार्श्वनाथ भगवान के प्रतिमा का क्षेत्र पर हर पोर्णिमा, अमावस्या एवं इतवार को सुबह 10.00 बजे एवं शेष दिनो मे सुबह 9.00 बजे पंचामृत अभिषेक होता हैं|

जटवाडाके समीप वर्ती क्षेत्र
एलोरा - 23 की. मी.
कचनेर - 50 की. मी.
पैठन - 64 की. मी.
अजंता - 105 की. मी.
जिन्तुर नेमगिरी- 195 की. मी.
नवागड़ - 235 की. मी.
कुन्थलगिरि - 205 की. मी.
गजपंथा नाशिक - 200 की. मी.
मांगीतुंगीजी - 190 की. मी.

❖ धनी-धनी चन्द्रपुरी के चंदा...निष्कलंक अरु ज्योति अमंदा....
चन्द्रपुरी के चन्द्र जिनंदा...अब चंद्रकार सिद्धशिला के नंदा...

पारस-मणि सम पार्श्व जिनेश्वर, जनहु कुंदन चरण स्पर्श कर....
पारस नाम हमे पार लगावे, मोक्ष को पा---रस ही फिर आवे...

आदि काल के आदि जिनेशा को मेरा त्रिवर नमोस्तु व् आदि जिनेश्वर जिन धर्म प्रणेता के चरणों में भक्ति प्रसून अर्पण! हे जिनेश्वर आप...कही गए नहीं बस...आज से करोडो वर्ष पहले.. आठो कर्मो को तोड़.....सिद्ध शिला पर अनंत काल के लिए विराजमान हो गए...आप इस युग की अपेक्षा से सर्व प्रथम थे हर बात में चाहे जनता को जीना सिखाना हो..उनको मोक्ष मार्ग दिखाना हो.... सबसे पहले केवलज्ञान रूपी ज्योति आपको ही आदिदेव श्री वृषभदेव स्वामी को प्राप्त हुई..क्योकि उनसे पहले तो मुनि परंपरा थी ही नहीं..उनको केवलज्ञान हुआ...फिर उनके उपदेश से जीवो ने मुनि पद को अंगीकार किया... आदिनाथ भगवान का प्रथम आहार राजा श्रेयांस के यहाँ पर हुआ था..आदिनाथ भगवान् 6 महीने के बाद तो आहार के लिए निकले..लेकिन...आहार विधि कोई नहीं जाने के कारण उनका आहार 7 महीने 8 दिन के बाद ही हुआ...कारण - उनका पूर्व कृत कर्म उदय जो उन्होंने गाय के मुख पर छींका बाँधने का उपदेश दिया था...जिसके कारण से गाय को भूखा रहना पड़ा था....तो आपने तप व् सहन शक्ति का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया और साथ में कर्म कितने कठोर हो सकते है की आपको भी नहीं छोड़ा...सन्देश किया...हे ऋषभदेव आप तो अनंत गुण के धारक हो...कहा तक कहू मैं आपके गुण...बस आपके जैसा होना चाहता हूँ...लेकिन कर कुछ नहीं पाता हूँ... और निराश हो जाता हूँ लेकिन फिर आपको देख कर...कुछ ख़ुशी होती है...और मन में बात आती है...

कैसे मेरे कर्म काटेंगे..मैं ये सोचु और घबराऊ....जब मैंने तुझे को पाया...घ्यान ये आया....तेरी स्तुति करने वाला...एक तेरे सामान बनेगा....एक दिन भी मेरे कर्म काटेंगे...अब मैं ये सोचु और हरषाऊ....

मुझे भी शक्ति मिले.....और आपके पद-चिन्हों पर चल पडू....और ऐसा चलू की बस चलता रहू....और आपके पास आ जाऊ..अनंत काल के लिए....आप साथ सिद्ध शिला पर..... और आपका परिवार तो और भी कमाल था...एक बेटा कामदेव बाहुबली...चक्रवर्ती को ही हरा दिया.....एक वर्ष तपस्या खड़े होकर तप...वाह! दूसरा बेटा और भी कमाल...चक्रवर्ती भरत...सिर्फ 48 मिनट में केवलज्ञान!! सारे पुत्र केवलज्ञान धारी हो मोक्ष चले गए...! आपके पोत्र और भी कमाल..मतलब भरत चक्रवर्ती के 623 पुत्र सीधा निगोद से आये और बोले ही नही..और चल दिए....मोक्ष.....आपकी पुत्री...ब्राह्मी और सुंदरी....भी कमाल आर्यिका दीक्षा लेली...आपका परिवार एक से बढ़कर एक महान व्यक्तियों के गुणों से भरा पड़ा है.....ऐसा परिवार तो इतिहास के पन्नो में देखने में नहीं आया....जय हो....

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❖ पर्युषण का आगमन, जीवन में आया है अनमोल, उत्तम क्षमा आदि धार तू, जय अरिहंत बोल!
क्षमा पारस जैसी, तप बाहुबली सा....ध्यान भरत तुल्य, संयम वृषभदेव सा....!!
तीर्थंकर की वाणी को ह्रदये में धारले...संयम तप आदि लेकर..जीवन संवार ले...ओह्ह्ह...

कुण्डलपुर/कुंडलगिरी [मध्य प्रदेश] से अन्तिम केवली श्रीधर स्वामी मोक्ष गए है!
कुंडलाकार ये पर्वत प्यारा, जहा शुशोभित जिनवर न्यारा, नमो नमो आदिश्वराय!

पंद्रह फुट की प्रतिमा साजे, पद्मासन प्रभु स्वयं विराजे, प्रतिमा में प्रतिठित प्राण, बड़े बाबा मेरे
विद्यासागर की तपोस्थली ये, इसका अतिशय बड़ा महान!! छोटे बाबा मेरे!

My bonjour to Tirthankara Rsabhadeva for his austerities had broken web of karma. Oh! Adinatha! Just give us potential to battle with karmic particles and One day surely soul will win!! My hundreds of thousand bow to Tirthankara!

READ ONCE THIS AMAZING STORY OF MIRACLE: The warrior of Bundelkhand king Ksatrasala succeeded in capturing his lost kingdom after Darshan (Prayer - worship) of miraculous Bare Baba. Then kind Ksatrasala helped in reconstruction of the temple. One Mugala Emperor tried to destroy Bare Baba, when he stroked on the thumb of colossus, milk flooded out from thumb and at the same time dense flocks of honey bees attacked on invaders and pushed them to run away. Then Mughala Emperor bagged pardon there and went shamefully.

अद्भुत द्रश्य - वीतरागी देव के सामने - वीतरागता के इक्छुक दिगंबर मुनि! जब बड़े बाबा नए मंदिर में विराजमान हुए तब आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज, मुनि श्री समयसागर जी और मुनि श्री योगसागर जी - मन्त्र-क्रिया शुद्धी करते हुए!

ॐ ह्रीं क्लीं श्रीं अर्हं श्री वृषभनाथतीर्थंकराय् नमः ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

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