27.12.2015 ►Acharya Shri VidyaSagar Ji Maharaj ke bhakt ►News

Posted: 27.12.2015
Updated on: 05.01.2017


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Ach Visuddh sagar ji maharaj in pravachan at "Arogya Bharti" mentioned the name of jain ayurveda book "Kalyan Kaarkam", that stores the words of tirthankars. Written by a Digamber sadhu... Contains details about every disease and its cure...

He mentions that other religions either talk about Karma or Nau Karma, but Jainism talk about both Karma and Nau Karma. Nau Karma contains nine things including aayu, etc.

He also mentions that medicines do not cure, its the penance(tapp) and purity of soul that cures a person. So always be pure and keep your soul pure.

Maharaj shree mentions the person who controls his shunya(zero) i.e., rajj and virya and lives a happy and incredible life becomes ultimate shunya(siddh Parmesthi) but a person who doesn't do so, cannot be cured by Medicines.

He Mentions that according to a Jain Scripture, human diet must be divided in four parts or we can say that we should divide the space of stomach in 4 parts and accordingly in summers, we should eat 1 part of solid food and 2 parts full of taral/jal/liquid. In Winters, we should eat 2 part of solid food and 1 part of taral/jal/liquid and in rainy season, we must have equivalent food and water level..

He mentions that there are 3 type of people... 1 who eats to live, 2 who eats for taste and 3, who lives to eat. and 2 and 3 type of people are always unhealthy.

With an example, he mentions that if someone(say X) shouts at another person(say Y), due to X, Nau Karma of Y starts and that cause the severe pain in headache. He also mentions that the best medicine in the world is the language of love that can heal any pain and misery.

The Kalyan Kaarkam speicfies details about Karma and Nau Karma.

At Arogya Bharti, during the meeting of Shramancharya with Vaidh ji Sushil ji, vaidji showed the 200 years and 1000 year old ghrit(ghee) and he told maharaj shri that this is so pure that if applied on the head of insane person, i.e., A single Massage make him fine.

He also shown the Real Pearl(Moti) and told Maharaj Shri that if a person who is suffering from Severe Thypoid, takes this Pearl with a glass of Water, his Thypoid is cured and thats why Thypoid is called "Moti Jhara" in Hindi and Regional Languages.

He also shown Prabal, Mukta, and many other medicines and told that all medicines are made while reciting the Namokar Mahamantra and Bhaktamar stotra.

Maharaj shree also told that if a baby of Some other mother is crying, the hand of another lady cannot stop him crying, but if his original mother just holds/touches him, he just stop crying. This happens due to the Feelings of lady for the baby. He mentions "Bhavna se hi aansu ruk jate hain aur sadhna se rog mit jate hain". Incredible.. Words by Muniraj....

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#GirnarJi #NeminathBhagwan #Vandana ❖ परम पूज्य समतासागर जी मुनिराज -शिष्य आचार्य विद्यासागर जी मुनिराज ---आज मुनिराज ने गिरनार जी में प्रवेश किया.. कल मुनिराज गिरनार पर्वत वंदना हेतु पहली टोंक जायेंगे तथा फिर आगे की वंदना करेंगे:) जय हो गिरनारी नेमिनाथ स्वामी!!!

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बाल शिक्षा ~ धर्म की रेल

आओ बच्चों खेलें खेल,
एक बनाएँ धर्म की रेल।
जीव रहे इसका इंजन है,
दस धर्मों के डिब्बे हैं।।१।।

सम्यग्दर्शन टिकिट है इसका,
सम्यग्ज्ञान की पटरी है।
सम्यक्चारित्र गुरू चलाते,
पहुँचा देती जल्दी है।।२।।

हम सब मिलकर बैठेंगे,
मोक्ष नगर को पहुँचेंगे।
वापस कभी न आयेंगे,
वहीं पे मौज मनायेंगे।।३।।

संकलन- क्षुल्लक श्री ध्यानसागरजी महाराज -
बच्चों सी मुस्कान संत की तस्वीर क्षुल्लक श्री ध्यानसागर जी की रचना "बाल शिक्षा"
आगम धारा परिवार जैनं जयतु शासनम् ।।

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Arhantas are Perfect Beings residing with body, who destroyed 'Ghatiya' or Destructive type of karmas. This type karma obstructs the soul from achieving its full potential. They are responsible for keeping soul entrapped in the ‘Sansara’ or World. If one can annihilate these destructive type 4 karmas by his best efforts, the soul can achieve its full potential of infinite knowledge etc. these 4 type karma are

1. Knowledge obstructing karma.
2. Intuition obstruction karma.
3. Energy obstruction karma.
4. Deluding karma.

Sansara is a Hindi language word, it means, the world where we live. And where all the worldly souls been entangled due to web of karmic bondage, cause brace of attachment and aversion. In Jainism, According Karma theory, there is no such thing 're about soul, as once soul get free from all karmic encumbrances and get emancipation. He never returns to be entrapped on karmic cycle.

So, let me try to explain with an example to clear it more logically.

In the milk has hidden butter by nature. And cheese too. But need to churn it to get butter/cheese, After having butter, can we mix butter/cheese into milk again as it was before? Simply no, we can't. Now question is who/how mixed butter in milk? Its naturally comes from root-place. As same thing with soul, who helped to soul to be entrapped with karmic particles? Nobody helped, its by nature [self-conducted] And soul as once get free from karmic particles by acceptance of gem-trio [Rational perception, rational knowledge and rational conduct] in the life. And soul gets salvation. After getting accurate nature of soul, can't get in the flaw of karma, because the cause [brace of Attachment and Aversion] is no more with soul. Actually Karma theory is so amazing so i must say to All of you read it intensively at-least once in life. For easy you may prefer 'Karma Kaise Kare' written by Muni Sri Kshamasagara Ji. I'm damn sure; you will get amazing insights and perception to view things. Best Wishes!

I tried to explain things, how Soul bonded with Karma by root naturally [from beginning-less time] to exemplify of Milk as it contain butter. - Nipun

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News in Hindi

निशंकित अंग --- जैसा सच्चे देव्-शास्त्र-गुरु का स्वरुप यहाँ बताया है वैसा ही है..अन्यथा नहीं है..इस तरीके की सच्चे मार्ग में अटल संशय रहित रूचि रखने वाले के निशंकित अंग होता है.

मिथ्या मार्गियों के बहकावे में न-आकर..मंत्र-यन्त्र-टोटके-अदि से जो अप्रभावित रहकर..जैसा जिन धर्मं में सच्चे-देव-सच्चे-शास्त्र और सच्चे गुरु का बताया है उसे अटलता से और संशय रहित तरीके से मानना और सच्चे मार्ग में रूचि रखने वाले को निशंकित अंग होता है

निशंकित अंग जिसके होता है वह आत्मा के सच्चे स्वरुप को जानता है...इसलिए उसे सात प्रकार के भय भी नहीं होते..जो की इस प्रकार हैं
१.इहलोक भय--इस जन्म के सगे-साथी,सम्बन्धी...अदि के बिछुड़ जाने का भय.
२.पर लोक भय-अगले जन्म में कहीं नरक तिर्यंच अदि गतियों में चले जाने का भय
३.वेदना भय-शारीर में पीड़ा अदि होने का डर,बीमारी अदि होने का डर.
४.अन-रक्षा भय --कोई भी मेरा रक्षक नहीं है,मुसीबत के समय में मुझे कौन बचाएगा...इस प्रकार का भय
५.अगुप्ती भय-चोर अदि के आ जाने से,सामान अदि चोरी हो जाने का भय
६.अकस्मात् भय--एकदम से किसी के आक्रमण करने अदि का भय,समुद्र में गिरकर अदि अकस्माक कारणों से मरने का भय.
७.मरण भय-प्राणों के वियोग का भय.

सही में यह सम्यक-दर्शन कितना महान है की पहला अंग आते ही सात प्रकार के भय...गायब भी हो जाते हैं...यानी की सम्यक-दृष्टी को यह सात प्रकार के भय आते ही नहीं.और वह हमेशा निशंकित रहता है.

निशंकित अंग में अंजन चोर प्रसिद्द हुआ...

कश्मीर देश के अंतर्ग्रत विजयपुर नगर का राजा अरिमथन था...उसके इकलौता बेटा था..इकलौता होने के कारण लाड प्यार की वजह से विद्या अध्यन नहीं कर सका..दुर्व्यसनी बन गया...बड़ा होकर प्रजा को त्रास देने लगा..तब राजा ने देश से निकाल दिया..
वह चोर डाकुओं का सरदार बनकर अंजन-गुटिका विद्या सिद्ध करके दुसरे पे मन-माने अत्याचार करने लगा..जिससे उसे अंजन चोर के नाम से जाना गया.

एक बार वह राजगृही के राजघराने से हार चुराके भाग रहा था..कोतवालों ने विद्या नष्ट करके उसका पीछा किया..वह शमशान में पहुंचा तोह..शमशान में एक वाट वृक्ष में सौ सींकों के एक छींके पर एक सेठ बैठा था....वह बार-बार चढ़ रहा और उतर रहा था..चोर ने पुछा यह क्या है...सेठ ने कहा मुझे जिनदत्त सेठ ने आकाश-गामिनी विद्या सिद्ध करने को दी है..किन्तु शंका है की यदि विद्या सिद्ध नहीं हुई तोह नीचे शस्त्रों पर गिरकर मर जाऊंगा..चोर ने कहा विद्या सिद्ध करने का उपाय मुझे बताओ...क्योंकि जिनदत्त सेठ मुनि-भक्त है..वचन कभी असत्य नहीं होंगे..सेठ ने विधिपूर्वक सब बता दिया...उसने महा-मंत्र का स्मरण करते ही एक साथ सभी डोरियाँ काट दी...नीचे गिरते हुए अंजन चोर को आकाश गामिनी विद्या देवी ने आकर विमान में बैठा लिया..और बोली आज्ञा दीजिये क्या करून..अंजन चोर ने कहा..मुझे जिन-दत्त सेठ के पास पहुंचा दो..विद्या देवता ने सुमेरु पर पहुंचा दिया...वहां पहुंचकर..उसने जिनदत्त से मिलकर उसे नमस्कार कर साड़ी बातें बता दी...अनंतर सम्पूर्ण पापों को छोड़कर देवर्षि मुनिराज के पास दिगम्बरी दीक्षा ले ली..तपस्या से चारण ऋद्धि प्राप्त कर ली...और केवलज्ञान प्राप्त कर कैलाश पर्वत से मोक्ष भी चले गए.......

निशंकित अंग का कितना बड़ा प्रभाव होता है की निशंकित होने से अंजन चोर को शस्त्रों से कट कर मर जाने का डर भी नहीं था.

धन्य हैं ऐसे निशंकित अंग को धारण करने वाला अंजन चोर...जो मुनिराज बनकर केवल ज्ञानी होकर मोक्ष को भी प्राप्त हो गए.

निशंकित अंग को पालन करने की प्रेरणा देने वाले अंजन चोर की कहानी की विडियो इस लिंक पर देखें.
www.youtube.com/watch पार्ट 1
www.youtube.com/watch पार्ट २
www.youtube.com/watch पार्ट 3

लिखने का आधार-श्री रत्नकरंड श्रावकाचार -टीकाकार-पंडित सदा सुख दास जी।....कहानी बाल-विकास 3
www.jambudweep.org से ली है। जय जिनेन्द्र. Punit jain

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