03.01.2016 ►Acharya Shri VidyaSagar Ji Maharaj ke bhakt ►News

Posted: 04.01.2016
Updated on: 05.01.2017

News in Hindi

❖ जैन समाज के लिए सोचनीय विषय समझदार समाज को समझने की आवश्यकता है अब बेटा और बेटी में फर्क करना बन्द हो और बेटी है घर में सुख शान्ति और परिवार की सुरक्षा है । ❖

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✿ French, Swiss doctors to study health secrets of Jains ✿

Jain community members don't eat after sunset, refrain from meat, fish and poultry or roots (potato, onion, etc). Ritualistic fasting is ingrained in Jain practices. What impact has such a lifestyle made on the community's well-being? Can such a lifestyle be healthy? These are some of the questions that have driven a team of French-speaking doctors from France and Switzerland on a study tour to Gujarat. The organisation usually studies local medicines and healing cultures across the world, but this is the first time that they have chosen to study lifestyle practices of a specific religion.
The team of 20 doctors, primarily from Societe de Formation Therapeutique du Generaliste (SFTG) (Society of Therapeutic Education of General Practitioners) in Paris, France, and Institut universitaire de medecine de famille (Institute of Family Medicine), in Lausanne, Switzerland, would visit Palitana, Patan, Porbandar, Santalpur and Jamnagar, apart from Ahmedabad in Gujarat, and Mount Abu and Udaipur in Rajasthan. For two weeks they will interact with Jain monks and experts and study in libraries of scriptures.

Dr Patrick Ouvrard from SFTG told TOI that the organization had earlier taken various medical practitioners to countries in Africa and even to some parts of India such as Karnataka, Tamil Nadu, West Bengal and Sikkim to understand local cultures of healing and traditional medicines.

"This is for the first time that we have focused on a specific religion for the study, as we wanted to understand Jainism's philosophy on food, way of life and concept of health. The religion has a number of ethoses such as respect to life, vegetarianism and practices such as always consuming filtered water that would have its impact on the followers. We wish to understand the phenomenon as general practitioners," said Ouvrard.

Dr Sophia Chatelard from IUMF added that in globalized world, it is better to get exposed to diverse cultures and practices. "Many a times, a patient wants to consult us whether it is good to also go for alternative therapy while the treatment is on. For me, it would be a peek into Indian practices and its health implications," she said.

Jitendra Shah, director of LD Institute of Indology, said that the team had visited the institute on Sunday where various experts had talked about Jainism in terms of anthropology, philosophy, science, architecture and practices. "Impact of Jain practices on health have been studied by scholars in India, but it is for the first time that a team has come to visit us on the subject. They had a number of questions about antiquity of various practices and their impact," he said.

He added that the team would visit a Jain monk in Junagadh who has conducted extensive research on the topic, and would also visit Gujarat Ayurved University to interact with their counterparts on practices such as ayambil and chovihar.

Article Source: Times of India [ timesofindia.indiatimes.com/city/ahmedabad/French-Swiss-doctors-to-study-health-secrets-of-Jains/articleshow/50391065.cms ]

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#AcharyaShri #VidyaSagarJi #Update आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज तारादेही जिला दमोह में विराजमान है, 15 से 21 जनवरी 2016 तक गुरुदेव के ससंघ सानिघ्य में होंगे पंचकल्याणक गजरथ महोत्सव के लिए 5जनवरी 2016 मंगलवार को प्रमुख पात्रो का चयन दोप 1.30 बजे से होगा।

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2016 task.. what is Dharma.. Is it really worthy to follow? ✿ धर्मं में मर्म या फालूत time waste??? ✿ जिन की वाणी का रहस्य....

Generally हम लोग सोचते है की धर्मं तो धर्मात्मा लोगो का काम है, फालतू लोगो का काम है, जो निठल्ले है संसार में जिनको कुछ करना नहीं आता वे लोग पंडित धर्मात्मा बन जाते है और मुनि आदि बन जाते है, और यही सबसे बड़ी दिक्कत है की हमने धर्म के लिए मन में जो बात बिठा ली है उसे उपर हम सोच ही नहीं पाते, हम बोलते तो अपने आप को 'Liberal + Educated + Well Standard + Super Minded Human been' लेकिन धर्मं के मामले में हम जीरो ही है और अन्धविश्वासी है लेकिन क्यों??? इसका Answer शायद ही किसी के पास हो?

हम लोग कभी ना ख़तम होने वाली सुविधाए चाहते है comfortable चाहते है, society में well respect and status चाहते है लेकिन आपने सोचा कभी की आप ये सब चीज़े क्यों चाहते है? क्योकि ये सब चीजों को मिलने का हमारा intention रहता है की हमें इससे ख़ुशी और शांति मिलेगा और दिल को बहुत अच्छा लगेगा...तो बात यहाँ आगई ही Ultimate जितना भी हम करते है खुश होने के लिए करते है अपने को अच्छा feel करवाने के लिए करते है, हम लोग शांति और ख़ुशी क्यों चाहते है क्योकि जीव का natural स्वभाव सुख है और दुःख उसको अच्छा नही लगता, हमने पिछले करोडो जन्मो में इन संसार की सब चीजों से ही अपने को सुख दिलवाने की और खुश होने की कोशिश की है और थोड़ी सी ख़ुशी मिलती भी है ऐसी बात नहीं, इसलीये इस जन्म में भी ऐसा कर रहे है

आज इस समय में जहाँ सभी और पैसा कमाने की होड़ लगी है धर्मं शब्द भी फालतू की बात लगती है. समय व्यर्थ करने का topic. धर्म को लेकर हमारे मन में कैसी picture उभरती है:

•1. बूढ़े लोगों का काम
•2. मंदिर जाना/ पूजा करना (सिर्फ इसलिए की परिवार की परंपरा है)
•3. प्रवचन सुनना
•4. विवाद का topic क्योंकि सभी अपने धर्मं (मंदिर/मस्जिद/गुरुद्वारा/ चुर्च) को ही अच्छा मानते है.

लेकिन यकीन मानिये... धर्म कोई बाहरी क्रिया नहीं जो किसी के कहने पर की जाये.... थोड़ी सी रूडियें अपना लेने को ही हमने धर्मं मान लिया है जो साम्प्रदायिकता के आलावा कुछ नहीं है
अभी ये प्रश्न मन में आएगा की ये कैसे हो सकता है, कैसी बात कर रहे हैं, अगर ये धर्म नहीं तो फिर धर्म क्या है। ऐसी जिज्ञासा होना ही बड़ी बात है और वही हमे आगे बदने के लिए प्रेरित करती है.

इससे पहले के हम धर्म के बारे में जाने, क्या अपने कभी सोचा है के ये धर्मं की बात सुनने की रूचि या जानने की उत्सुकता किसी की कम या जयादा क्यों होती हैं.
इसके कई कारण हैं और वे सब दूर हो जाये तो ऐसा नहीं हो सकता की समझ में न आये:
1. धर्म को फ़ोकट की वस्तु समझना -
यही हम धर्म को फ़ोकट की वस्तु न समझ कर वास्तव में कुछ हित की समझे और कानों में शब्द पड़ जाने मात्र से संतुष्ट न होकर वक्ता के या शास्त्रों के अभिप्राय (कहने का कारण) को समझने का प्रयत्न करें तो धर्मं की वास्तविकता जरूर से समझ में आएगी. " शब्द सुने जा सकते हैं अभिप्राय नहीं "

2. वक्ता (बताने वाला) की अप्रमाणिकता -
अगर बोलने वाले ने स्वयं धर्मं का सही स्वरुप न समझा हो और जो उसके खुद के जीवन से न झलकता हो तो समझो वो बोलने वाला स्वयं सिर्फ शब्दों को आप तक पहुंचा रहा है उसका अभिप्राय आप तक नहीं पहुच सकता क्योंकि वो सिर्फ अनुभव करा जा सकता है. आप खुद पहचान कर सकते हैं:
-जिसका जीवन सरल, शांत व दयापूर्ण हो,
- जिसके शब्दों में माधुर्य हो, करुणा हो और जिसके शब्दों में पक्षपात की बू न आती हो,
-जो हठी न हो,
-संप्रदाय के आधार पर सत्यता को सिद्ध करने का प्रयत्न न करता हो,
-वाद विवाद रूप चर्चा करने से डरता हो,
-आपके प्रश्नों को शांति से सुनने की क्षमता हो और उसे कोमलता से समझाने का प्रयत्न करता हो, आपकी बात सुन कर जिसे irritation न होता हो,
-जिसके मुख पर हमेशा मुस्कान रहती हो,
-विषय भोगो से जिसे उदासी हो, और त्याग करने से जिसे संतोष होता हो,
-अपनी प्रशंसा सुनकर प्रसन्न और अपनी निंदा सुनकर रुष्ट (angry) न हो

3. सुनने वाले के दोष - उतावली करना, कमियां देखना आदि
4. विवेचन (analysis) में अक्रमिकता - कही गयी बात को उसी क्रम में नहीं समझना
5. पक्षपात रखना - अगर शुरू में ही धर्मं को सांप्रदायिक रूप में मान लो तो कुछ और नया समझ नहीं आता

अगर ये पांच कारणों का आभाव हो जाये तो ऐसा नहीं हो सकता के तुम धर्मं के प्रयोजन को व उसकी महिमा को ठीक ठीक जान न पो और जानकार उससे इस जीवन में कुछ नया परिवर्तन लाकर इसके मीठे फल को प्राप्त न कर लो; और अपनी पहले की गयी धार्मिक क्रियाओं के रहस्य को समझ कर उन्हें सार्थक न बना लो.

अभी हम आगे देखंगे की धर्म की हमारे जीवन में आवश्यकता ही क्या है? हमे नहीं लगता के ये हमारे दिन प्रतिदिन के कार्यों के लिए आवश्यक है. हमारा जीवन तो बिना किसी धार्मिक क्रिया को करके भी अच्छे से चल रहा है तो फिर हमे philospher बनने की क्या जरूरत है? प्रश्न बहुत सही है और होना भी चाहिए. मनुष्य में सोच विचार की क्षमता है यही तो उसकी खूबी है और उसके इस्तेमाल सही दिशा में हो तो कहने ही क्या........

SOURCE - typing by Nipun Jain, Based on Jinenedra Varni Ji 'Shanti Path Pradarshan' Book, everyone must read this book once in a life...

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