Chobisi ►11 ►Stavan for Bhagwan Shreyamsanatha

Posted: 02.04.2016

Chobisi is a set of 24 devotional songs dedicated to the 24 Jain Tirthankaras.


Composed by:

Dedicated to:

Acharya Shree Jeetmalji
Acharya Jeetmal
 

Language: Rajasthani:
 

11~~तीर्थंकर श्रेयांस प्रभु

श्रेयांस जिनेशवरु! प्रणमूं नित बेकर जोड़ रे।

मोक्ष मार्ग श्रेय शोभता,धार् या स्वाम श्रेयांस उदार रे।
जे जे श्रेय वस्तु संसार में,ते ते आप करी अंगीकार रे।
ते ते आप करी अंगीकार,श्रेयांस जिनेश्वरु।....।।१।

समिति गुप्ति दुर्धर घणां,धर्म शुकल ध्यान उदार रे।
ए श्रेय वस्तु शिवदायनी,आप आदरी हरष अपार रे।।२।।

तन चंचलता मेट नें पद्मासन आप विराज रे।
उत्कृष्ट ध्यान तणों कियो, आलंबन श्री जिनराज रे ।।३।।

इंद्रिय विषय विकार थी,नरकादिक रूलियो जीव रे।
किंपाक फल नीं ओपमा,रहिये दुर थी दूर सदीव रे ।।४।।

संजम तप जप शील ए,शिव-साधन महा सुखकार रे।
अनित्य अशरण अनंत ए, ध्यायो निर्मल ध्यान उदार रे।।५।।

त्रीयादिक नां संग ते,आलंबन दुख दातार रे।
अशुद्ध आलंबन छांड नैं,धार् यो ध्यान आलंबन सार रे।।६।।

शरण आयो तुझ साहिबा,करूं बार-बार नमस्कार रे।
उगणीसै पूनम भाद्रवी,मुझ वरत्या जै जै कार रे।।७।।

 

Lord Shreyansnath
Bhagwan Shreyamsanatha

Rhinoceros
Symbol - Rhinoceros


 

 

 

 

11

Stavan for Bhagwan Shreyamsanatha

 

Acharya Tulsi

5:27

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Babita Gunecha

5:18

Language: Hindi
Author: Acharya Tulsi

अर्थ~~11~~तीर्थंकर श्रेयांस प्रभु

अर्हत् श्रेयांस! में बद्धांजली होकर तुम्हे प्रतिदिन प्रणाम करता हूँ।

श्रेयांस प्रभो! मोक्ष मार्ग के लिए जो श्रेय था,उसे तुमने धारण किया। इस संसार में जो जो श्रेय वस्तुएं थीं,उन सबको तुमने अंगीकार कर लिया।

अत्यन्त दुर्धर समितियां,गुप्तियां एंव उदार धर्म ध्यान और  शुक्ल ध्यान -ये मोक्षदायक (शिवदायक)श्रेय तत्त्व हैiतुमने अपार प्रसन्नता के साथ इनका वरण किया ।

प्रभो! तुमने शारीरिक चंचलता छोड़ पद्मासन की मुदा में विराजमान हो उत्कृष्ट ध्यान का आलंबन लिया ।

इन्दिय -विषय-जनित विकार के कारण जीव नाक आदि गतियों में भटकता हैा तुमने इन्हे किम्पाक फल से उपमित किया है, इसलिए इससे सदा दुर रहना श्रेयस्कर है  ।

संयम,तप,जप,और शील मोक्ष के साधन ओर महान् सुख देने वाले है।तुमने अनित्य,अशरण और अनन्त की अनुप्रेक्षा निर्मल और उदार ध्यान किया।

स्त्री आदि का संग दुः खदायक आलम्बन हैा तुमने इस अशुद्ध आलम्बन को छोड़कर सारभूत ध्यान -तत्त्व का आलम्बन किया।

प्रभो! में तुम्हारा शरणागत हूँ और तुम्हे पुनः पुनः नमस्कार करता हूँ।
इससे मेरे जीवन में जय जयकार हुआ है।

रचनाकाल-विं.सं.१९००,भाद्रवी पूर्णिमा ।

 

English Translation:

11th Tirthankara Bhagwan Shreyansnath

Arhat Shreyansnath! I beseechingly bow you everyday.

Lord Shreyans! You adopted that which was worthy to get the destination Moksha. The worthy things in this world were accepted by you.

Extremely arduous 5 Samitis, 3 Guptis, tolerant Dharmya Dhyan and Shukla Dhyan are Moksha giving factors. You adopted them with ultimate happiness.

Lord! You left the physical mobility, set in the Padmasana Posture and took the mount of noble Dhyan.

Soul aberrates in the four Gatis like Narak etc. because of the Indriyas and lust generated spoiling. You similed them as Kimpak Fal. So, it is better to stay away from these.

Sanyam, Tapa, Japa and Shilas are the mediums to carry towards Moksha. You did Anupreksha of Anitya, Asharan and Anant and also did the vestal and tolerant Dhyan.

Company of a female is cumbersome. You gave up this impure company and mount the essential Tatva Dhyan.

Lord! I am in your patronage and bow before you again and again. Because of this, ovation became in my life.

Time of Composing - V.S. 1900, Purnima (15th day) Bhadrava.

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Author

Source/Info

Project: Sushil Bafana
Text contributions:
Rajasthani & Hindi: Neeti Golchha
English: Kavita Bhansali