Chobisi ►15 ►Stavan for Bhagwan Dharmanatha

Posted: 09.04.2016

Chobisi is a set of 24 devotional songs dedicated to the 24 Jain Tirthankaras.


Composed by:

Dedicated to:

Acharya Shree Jeetmalji
Acharya Jeetmal
 

Language: Rajasthani:
 

15~~ तीर्थंकर धर्म प्रभु

अहो प्रभु परम देव प्यारा।

धर्म जिन धर्म तणा धोरी,त्रटक मोह -पाश नाख्या तोड़ी ।
चरण -धर्म आतम सूं जोड़ी,अहो प्रभु परम देव प्यारा ।।१।।

शुकल ध्यानामृत रस लीना,संवेग रसे करि जिन भीना।
प्याला प्रभु उपशम नां पीना,अहो प्रभु परम देव प्यारा ।।२।।

जाण्या शब्दादिक मोहजाला,रमणि -सुख किंपाक सम काला ।
हेतु नरकादिक दूख आला,अहो प्रभु परम देव प्यारा।।३।।

पुद्गल सुख अरि जाण्या स्वामी,ध्याने थिरचित आतम -धामी।
जोड़ी युग केवल नीं पामी,अहो प्रभु परम देव प्यारा।।४।।

थाप्या प्रभु च्यार तीरथ तायो,आख्यो धर्म जिन आज्ञा मांह्यो।
आज्ञा बारै अधरम दुखदायो,अहो प्रभु परम देव प्यारा।।५।।

विरत धर्म धर्म -जिनंद ख्याता,अव्रत कही अधरम दुख दाता।
सावद निरवद जू जुआ कह्या खाता, अहो प्रभु परम देव प्यारा।।६।।

बहुजन तार मुक्ति पाया,उगणीसै आसू धुर दिन आया ।
धर्म जिन रटवै सुख पाया,अहो प्रभु परम देव प्यारा।।७।।

 

Lord Dharmanath
Bhagwan Dharmanatha


Vajra
Symbol - Vajra


 

 

 

 

15

Stavan for Bhagwan Dharmanatha

 

Acharya Tulsi

4:21

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Babita Gunecha

3:21

Language: Hindi
Author: Acharya Tulsi

अर्थ~~ 15~~ तीर्थकर धर्म प्रभु
प्रभो! मेरे सर्वाधिक प्रिय देव तुम्हीं हो ।

धर्म प्रभु! तुम धर्म -धुरा को धारण करने वाले हो ।तुमने चारित्र धर्म के साथ आत्मा को जोड़ा और  एक झटके से मोहपाश तोड़ डाला।

तुम शुक्ल ध्यान रूपी अमृत रस में लीन थे,और तुम प्याले भर-भर उपशम रस का पान करते थे।

प्रभो! तुमने जाना -शब्द आदि इन्द्रिय -विषय मोहपाश हैं और वैषयिक सुख किम्पाक फल के समान अनिष्ट कारक तथा नऱक आदि में होने वाले दुःखों का उत्कृष्ट हेतु है।

धर्म प्रभु! तुम पौद्गलिक सुखों को अहितकर जान,ध्यान में चित्त  को स्थिर कर आत्म -धाम में पहुंच गये।वहां तुम्हें एक जोड़ी मिली -केवलज्ञान और केवलदर्शन ।

प्रभो!तुमने चतुर्विध तीर्थ की  स्थापना की ।तुमने बताया -अर्हत्त् के अनुशासन में धर्म है और अनुशासन के बाहर अधर्म है,वह दुःख देने वाला है।

अर्हत् र्धम ने व्रत को धर्म और अव्रत को अधर्म बतलाया ।सावध और निरवध के खाते अलग -अलग है।

प्रभो! तुमने बहुत लोगों को संसार -समुद्र के पार पंहुचाकर मुक्ति का वरण किया ।धर्मप्रभु का नाम जपने से मुझे बहुत सुख मिला।

रचनाकाल -विं.सं.१९००,आश्विन कृष्णा प्रतिपदा।

 

English Translation:

15th Tirthankara Dharmanatha

Lord Dharmanatha! You are the foremost dear to me.

Lord Dharmanatha! You are the one who adopts the axle of Dharma. You have connected the soul with the Charitra Dharma and smashed the snare of illusion.

You were logged in with the ambrosia like Shukla Dhyan and sipping continuously  the delight of Upasham cup by cup.

Lord! You came to know that all the matters of Indriyas are the snare of illusion and lust is like the Kimpak Fal, it is noxious and the root cause of suffering with sorrows given in the hell.

Lord Dharmanatha! You came to know that the materialistic pleasure is harmful. So, you engrossed your Chitta in the meditation and reached inwards the soul. You got a pair of Keval Gyan and Keval Darshan there.

Lord! You founded the Chaturvidh Dharm Sangh (the religion accomplished with four bodies - Sadhu, Sadhvi, Shravak and Shravika). You preached that living under the discipline of Arhat is Dharm and going against this is Adharma, which is cumbersome.

Arhat perceived Varta as Dharm and Avarta as Adharma. Accounts of Savadhya (with sin) and Nirvadhya (without sin) are different.

Lord! You made many people to cross the Bhavsagar (earthly concern) and avail the Moksha. I got a great rejoice by chanting the name of Lord Dharmanatha.

Time of Composing: V.S 1900, 1st day of Krishna Ashwin.

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Author

Source/Info

Project: Sushil Bafana
Text contributions:
Rajasthani & Hindi: Neeti Golchha
English: Kavita Bhansali