05.02.2017 ►Acharya Shri VidyaSagar Ji Maharaj ke bhakt ►News

Published: 05.02.2017
Updated: 07.02.2017

Update

While Jainism traces its philosophy from teachings of Tirthankara 🙂 various Jain philosophers like Acharya Kundakunda, Acharya Umaswami, Acharya Samantabhadra and Acharya Pujyapada etc have contributed greatly in developing and refining the Jain and Indian philosophical concepts. 😍😇

जब निर्धन के घर आये भगवान... #AcharyaVidyasagar #आचार्यविद्यासागर आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज अमरकण्टक छत्तीसगढ़ में चातुर्मास के बाद विहार करके पेण्ड्रारोड गए थे, वहाँ एक पति पत्नी छोटे से टूटे - फूटे घर में रहते थे, पति अपनी पुरानी साईकिल से गाँव गाँव जाकर चूड़ी,बिंदी, काजल, बेचकर घर चलाता था...

उनकी पारिवारिक संपत्ति का भी विवाद चल रहा था जहाँ से उन्हें कुछ मिलने की कोई संभावना नही थी, माली हालत बहुत ही ज्यादा खराब थी एक दिन आचार्य भगवन वहाँ विहार करते हुये आये, तो उसकी पत्नी में बोला देखो जी आज हमारे नगर में आचार्य श्री और उनका संघ आया है, हम उनके लिये चौका लगायेंगे, पत्नी की बात सुनकर पति बोला अरे ये कैसे हो पायेगा, हमारे पास ना वर्तन हैं ना घर में कोई पकवान बनाने के लिये सामग्री, और घर की छत पर खपरैल है जिससे बारिस का पानी घर में गिरता है, ऐसे में चौका लगाना कैसे सम्भव होगा लेकिन पत्नी जिद पर अड़ गई और उसने अपने पड़ोसियों से चौका लगाने वाली आवश्यक सामग्री जुटाना प्रारम्भ कर दिया, और आखिर में चौके की तैयारी पूर्ण हुई

दोनों पति पत्नी पढ़गाहन करने खड़े हो गए, वहाँ और भी कई बड़े बड़े घरों के चौके लगे थे, दम्पत्ति (पति पत्नी) का घर मन्दिर से दूर था तो उन्हें विश्वास ही नही था की कोई मुनिराज हमारे घर तक आ पाएंगे, आचार्य संघ की आहार चर्या शुरू हुई, आचार्य भगवन मन्दिर से निकले रास्ते में चौके वाले हे स्वामी नमोस्तू हे स्वामी नमोस्तू बोले रहे हैं 😲😲😲...... पर ये आचार्य भगवन तो किसी को देख ही नही रहे, वो उसी के चौके की ओर बढ़ते जा रहे थे, ऐसा लग रहा था जैसे भक्त की करूण पुकार उन्हें वहाँ खींचकर ले जा रही हो, थोड़ी दूर जाकर आचार्य श्री जी का पढ़गाहन उसी चौके में हो गया, जैसे ही गुरूजी खड़े हुये.. उस दम्पत्ति के आँखों से अश्रु की तेज धारा बहने लगी, बड़ी मुश्किल से शुद्धि बोली, और चौके में आकर गुरूदेव को उच्च आसन ग्रहण करने को कहा, परन्तु अश्रुधारा अभी भी तेजी से बह रही थी, रोते रोते ही आचार्य श्री की पूजन की, नीचे रखने के लिये कोई और पात्र था नही इसलिये वहाँ कढ़ाई रख दी, और आहार शुरू हुये, लेकिन लगता है उस दम्पत्ति को अभी और परीक्षा देनी थी, आहार शुरू होते ही तेज बारिस होने लगी, जिस स्थान पर आचार्य श्री खड़े थे उस स्थान को छोड़कर चौके में कई जगह बारिस का पानी गिर रहा था, चौके में खड़े लोग भी अपनी जगह से यहाँ वहाँ खिसक कर आहार दे रहे थे, पर कलयुग के महावीर को तो आज चन्दन बाला के घर आहार लेने थे, तो वो भी चेहरे पर मन्द मन्द मुस्कान लिये आहार ले रहे थे, आखिरकार निरान्तराय आहार सम्पन्न हुये,

आचार्य श्री वापिस आकर मन्दिर के बाहर बने मंच पर विराजमान हुये, और बोले आज जैसे अच्छे आहार हमने कभी नही किये सभी दातारों ने बहुत शांति से आहार कराये आज ऊपर से बारिस हुई और चौके वालों की आखों से भी, ये सुनते ही उस दम्पत्ति की आँखे फिरसे नम हो गईं, उन्होंने विशाल ह्रदयी गुरूजी के बारे में अभी तक सुना था आज देख भी लिया, कुछ दिनों बाद उस दम्पत्ति का व्यापार और अच्छा चलने लगा, उनका पारिवारिक संपत्ति का विवाद भी सुलझ गया, जिस कुटिया में गुरूदेव के चरण पड़े थे वहाँ आज पक्का और बड़ा घर बन गया, अब वो दम्पत्ति सुख से अपना जीवन व्यतीत करने लगे

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कार्य योजना के साथ शुरू करें मंगल कार्य: आचार्यश्री विद्यासागर जी:)) exclusive picture.. alive replica of lord mahavir..

कार्य योजना बना कर ही मंगल कार्य का आगाज करना चाहिए। बगैर योजना बनाए कार्य प्रारंभ करने से वह सफलता के सोपान तय नहीं कर पाता है। सभी को योजना के अनुसार ही कार्य करना चाहिए। ऐसा करने से आत्म संतुष्टि का भाव आता है। यह मंगलमयी उपदेश आचार्य विद्यासागर महाराज ने शनिवार को धर्मसभा में दिए। आचार्यश्री बुधवारा बाजार में आयोजित धर्मसभा उपस्थित श्रावकों को संबोधित कर काम को व्यवस्थित करने की कला को विस्तार से समझा रहे थे।

आचार्यश्री ने बताया कि कार्य योजना बना कर कार्य करें। भविष्य में संपन्न किए जाने वाले कार्य योजना अनुसार सक्रिय हो जाते है। प्रतीक्षा नहीं योजना करना है, कार्य का आगाज किए जाने के लिए निकलवाए जा रहे मुहूर्त से पहले सोेच लो, कि कार्य समय पर पूर्ण हो जाएगा। आचार्य श्री ने कहा कि वर्तमान में रुपयों पर भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि रुपयों के स्थान पर छदम पर भरोसा करना चाहिए। छदम पर भरोसा रख कर ही कार्य को पूर्ण किया जाना चाहिए। तभी काम पूर्ण होना संभव हो पाता है। कहावत बताई कि ताकत कम और गुस्सा ज्यादा लक्षण है पिट जाने के तथा आमद कम और खर्चा ज्यादा लक्षण है मिट जानेेे के। दोेनाें ही बातों को ध्यान में रख कर कार्ययोजना बनाई जाए।
भावना अंदर से महसूस की जाती है बाहर से नहीं

: आचार्यश्री ने कहा कि भावना अंदर से महसूूस की जाती है बाहर से नहीं। भावना की आवाज अंदर से निकालती है, जो कि सार्थक होकर कार्य को पूर्ण करानेे में लाभ दायक सिद्ध होती है। भावना ही बाहर वातावरण का निर्माण भी करती है। कोई भी कार्य अंदर अलग स्वरूप लिए हुए होता है जबकि बाहर आने पर उसका स्वरूप बदल जाता है। कार्य को सिद्ध करने में भावना ही कारक बनती है

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ना बुरा होगा,

ना बढ़िया होगा,

होगा वैसा,

जैसा नज़रिया होगा.!

दृष्टि सुधारने से.. देखने का नज़रिया बदल जाता हैं:) Have Rational Insight -^^

हर शादी पण्डल मे इस चित्र जरूर लगाना चहिऐ

(सभी से विनम्र निवेदन है)

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