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Posted: 26.04.2017

Jain Star


25.04.2017

गुणवत्ता प्रचुरता से अधिक महत्वपूर्ण
(Quality is always better than quantity)
by -आगमवेत्ता साध्वी वैभवश्री ‘आत्मा’
अधिकांश लोग तादाद पर, मात्रा पर, संख्या बल पर अधिक ध्यान देते हैं, बजाय गुणवत्ता के, चाहे वह किसी भी विशय क्षेत्र में हो।
माना कि संख्या बल का भी अपना एक महत्व है, वह प्रचुरता का अहसास कराता है किन्तु वास्तविक महत्व उसमें मौजूद गुणवत्ता का ही है। जहाँ गुणाधिक्य है (Quality) है वहीं स्थायित्व भी है, वहीं प्रामाणिकता भी है, वहीं प्रगति भी है। जहाँ प्रगति है वहाँ नवीनता है, आनन्द है, ताज़गी भरा अहसास है।
चाहे आप किसी भी विषय क्षेत्र को ले लें, हमेशा (Quality) ही राज करती है। जो गुणवान होता है, वही स्वामी (master) भी होता है। गुणवत्ता बढ़ाने पर ध्यान देने वाला व्यक्ति ही लगातार विकसित भी हो पाता है। विकास की नींव गुणग्राहक दृष्टि पर टिकी है। जो सदा गुणों का प्रत्याशी है, गुणों का विकास करने को तत्पर है, योग्यता बढ़ाने को अभ्युत्थित(attentive) रहता है, उसे अपनी राह से डिगाने वाला एक प्रमुख तत्व है-भीड़ का आकर्षण।
अगर कोई भीड़ जुटाने में लगा है तो वह भीड़ की मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाएगा। हमें जानना चाहिए कि क्या होती है भीड़ की मानसिकता?
1. भीड़ सदा ग़ैर ज़िम्मेदार होती है, वह कभी भी अपनी ज़िम्मेदारी खुद नहीं लेना चाहती। वह किसी अन्य का शरणा तलाशती है, किसी अन्य से अपनी सुरक्षा चाहती है, सुरक्षा की गारंटी पाना चाहती है इसीलिए उसे किसी को (follow) करने के लिए बाध्य भी होना पड़ता है। किसी अन्य का गुलाम भी होना पड़ता है। जबकि वह इंसान जो ‘काबिल’ है, योग्य है, कभी भी अपनी ज़िम्मेदारी किसी अन्य पर नहीं लादता। वह स्वयं को इस लायक बनाता है कि हर आगत परिस्थिति पर ज़िम्मेदाराना रवैया अपना सके। खुद को संभाल सके व औरों को भी संभालने वाला बन सके।
ज़िम्मेदारी लेने का तात्पर्य न केवल आर्थिक रूप से सक्षम बनना है वरन् सामाजिक व आन्तरिक रूप से भी सामर्थ्यवान बनना है। जो समर्थ है, सक्षम है, वे कभी भी भीड़ की तरह हांके नहीं जा सकते। वे किसी अन्य द्वारा बरगलाए नहीं जा सकते। उन्हें अपनी समझ से जीना आता है। होशो-हवासपूर्वक बोलना व निर्णय करना आता है। यही कारण है कि गुणवान व्यक्ति की कद्र होती है जबकि आंतरिक व आर्थिक रूप से असक्षम, हीन भाव ग्रस्त व्यक्ति की (leading)होती है, उन पर नेतृत्व किया जाता है।
2. भीड़ में वैयक्तिकता नहीं होती (individuality) नहीं होती, इसी कारण उसकी कभी मुक्ति नहीं होती।
जो गुणवान है, योग्य व काबिल है वह अपनी आंतरिक प्रतिभा को खिला सकता है, अपनी निजता में जी सकता है, उसको किसी की नकल करने या अनुकरण करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। जबकि अधिकांश लोग नकलची होने के कारण ही भीड़ का हिस्सा बने रहते हैं। भीड़ को बलवान होने का भ्रम हो सकता है किन्तु बलवान तो केवल गुणवान व काबिल इंसान ही हो सकता है।
सामाजिक संगठन हो या व्यापारिक; धार्मिक संघ हो या पारिवारिक परिदृश्य-प्रत्येक क्षेत्र में आगे बढ़ रहे, सक्षम बन रहे युवाओं को यह कहकर डराया जाता है कि अगर तुम कुछ नया करोगे तो बहुत सारे लोग तुम्हारा साथ छोड़ देंगे, तुम्हारा विरोध करेंगे। अच्छा यही है कि तुम इन लोगों के साथ रहने के लिए इनके जैसे ही बने रहो। कुछ नए परिवर्तनों के हिमायती मत बनो। जैसा तुम्हारे पूर्वजांे ने किया है, उसका ही अनुकरण करो। अपनी प्रतिभा व प्रज्ञा का प्रयोग करके कुछ विशिष्ट होने की इच्छा छोड़ दो अन्यथा जनमत व बहुमत से हाथ धो बैठोगे। ऐसी बातें सुनकर जिस युवा मन पर समूह मानसिकता का प्रभाव हावी हो जाता है, वह घबरा कर अनुयायी बनना पसंद करता है, लोगों की राय में, हाँ में हाँ मिला लेता है और उनके मापदण्डों में (adjust) होने में ही अपनी सफलता मान लेता है। जबकि ऐसे में वह अपनी निजता, मौलिकता व प्रामाणिकता खो चुका होता है। भीड़ का सम्मान तो उसे मिल जाता है किन्तु अपना भान (ज्ञान) विस्मृत हो जाता है।
शनैः-शनैः क्रान्त चेतना सुप्त होने लगती है, ज़मीर की स्वतंत्रता धन-पद-यश के हाथों बिकने लगती है, लोगों द्वारा लगाए जा रहे जयकारे या (supporting thumbs) ही उसकी लाइफ लाईन बन जाते हैं। किन्तु व्यक्ति खुद ही खुद में अपरिचित बन जाता है। खुद को खोकर और सब पाया भी तो क्या पाया? भीड़ का हिस्सा बनने की चाहत गुलाम रहने की आदत के सिवाय और क्या हो सकती है?
आइए जानें, कौन बनना चाहेगा भीड़ का हिस्सा?
*वह जो, औरों से अपनी तारीफ पाकर खुद को काबिल मान लेता है, वह भीड़ का हिस्सा हुए बगैर नहीं रहेगा।
*वह जो, औरों से प्राप्त आलोचनाओं से प्रभावित होकर अपना मार्ग बदलता रहता है, वह भीड़ का हिस्सा हो ही जाएगा।
*जिसके भीतर भय है, साहस का अभाव है, ‘लोग क्या कहेंगे’- ऐसी सोच का प्रभाव है, वह भीड़ का हिस्सा ही है।
*भीड़ का हिस्सा बनना उसी के लिए संभव है जिसके ज़ज्बात दूसरों के गुलाम है। जिसकी खुशी व गम अन्यों के हाथ है।
*जिसकी ख्वाहिशें ज्यादा है, कल्पनाएँ बेलगाम हैं वह गुणवान कम व भीड़ का मोहताज ज्यादा है।
आईये, जानें, गुणवत्ता को पहचानें-
*जो शोर कम व काम अधिक करता है, वह गुणवान है। जो ख्वाबों को नहीं बुनता, तथ्यों को तलाशता है, वह गुणवान है। जो हार-जीत, निंदा-तारीफ, हानि-लाभ हर पड़ाव में मुस्कुराना जानता है- वह गुणवान है।
*जिसे चापलूसी ललचाती नहीं, आलोचना उद्विग्न नहीं करती, विरोध क्रोध पैदा नहीं करवा पाता, वियोग व्यग्र-बेताब नहीं बना पाता- वह गुणवान है।
*जो सत्यशील, निर्भीक व दीर्घदृष्टा है- वह गुणवान है। ऐसे गुणवान का हृदय से बहुमान है।
ऐसे लोग संख्या में चाहे अल्प ही क्यों न हो, किन्तु एक चन्द्रमा की भांति सैकड़ों तारागणों व नक्षत्रों से भी अधिक प्रकाशवान है।
सच ही कहा है किसी ने कि-
Quantity नहीं, Quality देखो
Quality is much better than Quantity
चंद व सूर्य अकेले ही पृथ्वी को प्रकाशित कर देते हैं जबकि सैंकड़ो तारे मार्गदर्शक नहीं बन पाते।
जय हो! जय हो! जय हो!
!! सबका कल्याण हो!!
प्रेषकः- साधिका प्राग्भा विराट

आज से 30 वर्ष पूर्व की कहानी पत्रकार डॉ मदन मोहन की जुबानी
Jain Star News Network, 25 अप्रैल, 2017
पत्रकारों की सही रिपोर्टिंग को भी कई बार संदेह की नजरो से देखा जाता है और जिनके विरोध में खबर छपती है वे माहौल बनाकर पत्रकारो की भावनाओ का भी मजाक उड़ाते देखे जाते है।मगर उन लोगो को कोई कहने वाला नही है,जो समाज के पैसों से अपनी दुकानदारी करते है।समाज के पास समय नही है,कि समाज के नाम पर किसी गलत काम करने वालो के खिलाफ आवाज उठाए और उनके खिलाफ आंदोलन करे ।मै आपको आप सब की जानकारी के लिए बता देता हू,कि किसी भी पत्रकार को सरकार,समाज या आपकी तरफ से कोई पैसे या तनख्वाह नही मिलती है ।और नही उनके परिवार या बच्चों को सुरक्षा।आपके समाज में कोई दबंग व्यक्ति कोई गलत काम करता है ।तो आप कभी उनकी आलोचना नही करते हो,क्योकि आपको पता है की अगर उनके खिलाफ बोल दिया तो हमारी दुश्मनी हो जायगी ।इसके लिए आप चुप बैठ जाते है और पत्रकार को बुला कर कहते हो की उनके खिलाफ आप लड़ो,क्यों पत्रकार के बीवी -बच्चे नही है ।उन लोगो से दुश्मनी करने पर पत्रकार -परिवार की हिफाजत आप करोगे?आपको सिर्फ अपना परिवार ही अच्छा लगता है ।और पत्रकार पर इतना दाग़ लगाते हो की आप उनको तनख्वाह दे रहे हो।अब में वापिस उस मेटर पर आता हू जो आज से 30 वर्ष पूर्व मेरे साथ घटित हुआ ।
पढ़िए पत्रकार की आप बीती-
धर्म के नाम पर चल रहे पाखण्ड, शिथिलाचार और व्यभिचार के खिलाफ रिपोर्टिंग करने पर मुझ पर क्या बीती पढ़िए उन्ही की जुबानी
आज 30 वर्ष पूरे हो गए। ठीक 30 वर्ष पूर्व आज ही के दिन25.04.1987 को रात्रि 12.40 बजे राजस्थान के माने हुए डकैतों व शातिर अपराधियों से मेरी हत्या करवाने के लिए हमला करवाया गया था। वे मार नहीं सके, लेकिन इस हमले में मेरे शरीर का एक अंग कट गया, जिसे वे निशानी के रूप में संबंधित वेशधारी (तथाकथित तांत्रिक-मांत्रिक श्वेत वस्त्रधारी श्रमण संघीय प्रवर्तक स्थानकवासी साधु) को भेंट चढाने के लिए ले गए कि हमने आपका काम कर दिया। पुलिस जांच एवं रिकॉर्ड के अनुसार इस तथाकथित साधु ने अपने अंधभक्तों से तब मुझे मारने के लिए 12 लाख रुपये दिलवाए थे। इनसे मेरा कोई व्यक्तिगत द्वेष नहीं था और न ही मैंने अपने जीवन में किसी के विरूद्ध कभी भी व्यक्तिगत द्वेष रखा है और न ही उसके कारण किसी के खिलाफ कभी कुछ लिखा है।
इस घटना का प्रतिवर्ष मैं स्मरण सिर्फ इसलिए करता हूं ताकि मुझे सतत सत्य लिखने की प्रेरणा और ऊर्जा मिलती रहे।
दरअसल उन दिनों मैं धर्म के नाम पर चल रहे पाखण्ड, शिथिलाचार और व्यभिचार के खिलाफ लिखकर तथाकथित अहिंसक समाज को सावधान कर रहा था, ताकि भोले,भावुक और धर्म-प्राण लोग वेशधारी ठगों के मायाजाल से बच सकें। मेरी कलम को रोकने के लिए मुझे तब लाखों रुपये देने की पेशकश की गई और मेरे पूरे परिवार पर सामाजिक दबाव बनाने का प्रयत्न किया, जिसे मैंने स्पष्ट रूप से नकार दिया और इस प्रकार की पहल का बहुत ही कठोर शब्दों में जवाब दिया और अपना लेखन जारी रखा। तब इन पाखण्डियों ने मुझे मारने के लिए पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक सेना के एक भगोडे, जिसने एक तहसीलदार के हाथ-पैर काट दिए और भीलवाडा के एक बैंक में डकैती के आरोप में साढे चार साल की सजा काटी ही थी, उसे हायर किया। केंकडी के इस डकैत गजराजसिंह ने अजमेर के शातिर क्रिमिनल दिलीप चौधरी और पाली के अजीत सिंह की एक गैंग बनाई और उदयपुर में एक टेक्सी किराये पर लेकर मकान का रास्ता बताने के नाम पर उदयपुर में तीन अन्य लोगों को अपने साथ लिया। रात12.40 पर मेरे निवास पर मुझ पर हमला किया गया। खैर...इस घटना के विस्तार में नहीं जाना चाहता, बस खून में बुरी तरह लथपथ होने के बावजूद घायल अवस्था में मैंने दौडकर इन लोगों का पीछा कर गाडी के नम्बर नोट किए, पडौसी सभी इकट्ठा हो गए। पुलिस को भी तत्काल जानकारी दे दी गई और वह भी हरकत में आ गई। तत्कालीन डीआईजी, पुलिस अधीक्षक और थानाधिकारी इस घटना से स्तब्ध थे और दिन-रात एक कर अपराधियों की धडपकड की। घटना की गहराई तक छानबीन की जो अपने आप में एक दस्तावेज है। हालांकि कोर्ट ने 18 वर्ष बाद मामले में टेक्सी ड्राइवर और मकान बताने आए लोगों को सजा सुनाई, लेकिन तीनों मुख्य अपराधी तो दो वर्ष के भीतर ही अपने कर्म उदय में आ जाने के कारण इस दुनिया से उठ गए। गजराजसिंह को किसी अन्य झगडे में उसके समानांतर दूसरे गुर्जर गिरोह ने गोली मार दी और पत्थर खदानों में घटना स्थल पर ही उसने दम तोड दिया, दिलीप चौधरी का पूरा शरीर घटना के एक माह में ही बुरी तरह सड़ना शुरू हो गया और खुजालने से उसके शरीर में पस पड गया, वह अपना मानसिक संतुलन भी खो बैठा और कुंए में गिरकर मर गया। अजीतसिंह स्वयं एक तहसीलदार का लडका था, लेकिन पिताई की भ्रष्ट कमाई के कारण गलत रास्ते पर था, विवाह से पूर्व रात्रि को उसकी गर्दन काटकर कोई ले गया। खैर...। जिस तथाकथित तांत्रिक-मांत्रिक वेशधारी साधु ने इन्हें भेजा, उसे दिल का दौरा पडा,बाइपास सर्जरी हुई,इसके बाद गिरने से कुल्हा टूट गया, उसका ट्रांसप्लांट हुआ, फिर घुटने भी बदलवाए,लिवर का भी ट्रांसप्लांट हुआ और दोनों किडनियां भी खराब हो गई है, इसलिए वह सतत डॉयलिसिस पर रहने को मजबूर है, क्योंकि आयुष्य शेष है। खैर....!
"घटना में मेरे बच जाने का अर्थ ही यह है कि मैं सत्य को कहूं, कहता रहूँ, परिणाम चाहे जो हों, धर्म के प्रति मुझे अपना फर्ज निभाते रहना है। मुझे मौत का कोई भय नहीं है।"

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