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Posted: 29.04.2017
Updated on: 03.06.2017

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फेसबुक पर जैन स्टार ने छुआ एक नया मुकाम
JainStarNewsNetwork,29 अप्रैल, 2017
हमें अपने पाठकों से ये खबर साझा करते हुए बेहद खुशी हो रही है कि जैन स्टार पेज ने 6000 लाईक का आंकड़ा पार कर लिया है।साथ ही जैन स्टार रीडर्स फोरम ग्रुप में 18500 के करीब सहयोगी सदस्य है। आंकड़ों की नजर से देखेंगे तो शायद यह संख्या मात्र दिखे, मगर यह एक यात्रा है जो जैन स्टार और उसका पाठक परिवार साथ-साथ तय कर रहे हैं। यह एक परिवार है जो लगातार एक दूसरे को आपस में जोड़ रहा है। एक दूसरे से बात कर रहा है, सुन रहा है, और एक अलग तेवर में कहीं और न मिलने वाली जानकारियों को साझा कर रहा है।
अपने पाठकों की राय को उचित प्लेटफॉर्म देने के लिए आपके सुझाव जरुरी है।जैन स्टार अपने फेसबुक पेज और ग्रुप में ज्वलंत धार्मिक और सामाजिक विषय पर वैचारिक बहस करता है जिसमें पाठक पूरी आजादी से अपने विचार रख सकते हैं। समय समय पर आपके मुल्यवान और प्रेरक समाज हित में रखे गए विचारों को जैन स्टार आपके फोटो के साथ अखबार में भी प्रकाशित करता है।जैन स्टार का प्रयास है कि गंभीर धार्मिक और सामाजिक बातों के जरिए समाज में जागरूकता लाई जाए ।
जैन स्टार अखबार फेस बुक,व्हाट्स अप्प,ईमेल,गूगल +,ट्विटर,अखबार और अन्य माध्यमो से जो संदेश प्रसारित करता हैं,वह लाखो पाठको तक पहुंचता है।यह आप सभी के प्यार और विश्वास का परिणाम है और इस उपलब्धि का श्रेय आप सभी को है।सभी को बधाई,धन्यवाद एवं आभार!

प्रवचन
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घर में मंदिर बनाने से पहले घर को ही मंदिर बनाएं - राष्ट्र-संत ललितप्रभ
Jain Star News Network, 29 अप्रैल, 2017
हुबली। हुबली के गोल्ड जिम हॉल में राष्ट्र-संत श्री ललितप्रभ सागर जी महाराज ने कहा कि जिस घर में हम 23 घंटे रहते हैं वहाँ तो हो-हल्ला करते हैं और जिसमंदिर-स्थानक में केवल आधा-एक घंटा बिताते हैं वहाँ बड़े शांत रहते हैं।कितना अच्छा हो कि हम घर को ही अपना मंदिर मानना शुरू कर दें और धर्म की शुरुआत मंदिर-मस्जिद की बजाय घर से करना शुरू कर दे तो हमारे 24 के 24 घंटे धन्य हो जाएंगे। केवल हाथों में पुखराज, मोती या नीलम पहनने से कुछ न होगा। ग्रह-गोचरों की शांति तभी होगी जब व्यक्ति अपने घर में प्रेम की मुरलियाँ बजाएगा।संतप्रवर हजारों श्रद्धालुओं से खचाखच भरे गोल्ड जिम हॉल में श्री आदिनाथ जिन मंदिर एवं दादावाड़ी ट्रस्ट द्वारा आयोजित सत्संगमाला के दौरान घर को कैसे स्वर्ग बनाएं विषय पर संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि आजकल घरों में भाई-भाई, देराणी-जेठाणी, सास-बहू अलग-अलग कमरों में रहते हैं, वे आपस में बोलते नहीं, बतियाते नहीं, एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराते नहीं,
सुख-दुख में काम आते नहीं ठीक वैसे ही जैसे कब्रिस्तान की कमरों में लोग
रहते हैं। वे भी आपस में कोई व्यवहार नहीं करते, अगर दोनों की यही हालत
है तो फिर घरों के कमरों में और कब्रिस्तान की कब्रों में फर्क ही कहाँ
रह जाता है? उन्होंने कहा कि प्लीज, अपने घर के कमरों को कब्रें मत
बनाइए। उन्होंने कहा कि पहले लोगों के पास मकान छोटे होते थे, पर दिल बड़ेसो चार-चार भाई भी साथ रह लेते थे और आज व्यक्ति ने मकान तो बड़ा बना लिया, पर दिल छोटा कर लिया परिणाम अब दो भाई भी साथ रह नहीं पा रहे हैं।अगर दिल को छोटा रखेंगे तो हमारे परिवारों की हालत पानी सुख चुके तालाब की तरह हो जाएगी जहाँ दरारों के अलावा कुछ नहीं बचेगा।
घर में ही है स्वर्ग और नर्क-संतश्री ने कहा कि स्वर्ग किसी आसमान में और
पाताल किसी नरक में नहीं होता। जिस घर में चार बेटे-बहुओं में माता-पिता
की सेवा के लिए तरसते रहते हैं, अपने हाथों से रोटी चूरकर उन्हें खिलाते
हैं वह घर का धरती का जीता-जागता स्वर्ग है। जिस घर में बूढ़े माँ-बाप को
अपने हाथों से खाना बनाकर खाना पड़ता हो वह घर साक्षात नरक है। आजकल अमीर घरों में लोग माता-पिता की सेवा के लिए नौकर रखते हैं, लेकिन मैं उन्हें पूछना चाहूँगा कि जब पत्नी से प्यार करना होता है तो वे किन्हीं नौकरों को बुलाते हैं क्या? जब प्यार खुद करते हो तो सेवा औरों से क्यों? सेवाभावी संस्थाओं के सदस्यों से संतश्री ने अपील की कि लॉयन्स क्लब या किसी रोटरी क्लब के सदस्य बनकर वृद्धाश्रम, अस्पताल या भिखारियों की सेवा
करना आसान है, पर घर बैठे माँ-बाप की सेवा करना मुश्किल है। आपकी सेवा के पहले हकदार बाहर के नहीं घर के बूढ़े लोग है। सोचो, जिन पत्थर की मूर्तियों को हम बनाते हैं उनकी तो हम खूब पूजा करते हैं, पर जो माँ-बाप
हमें बनाते हैं उनकी पूजा करने से हम क्यों कतराते हैं? याद रखें, बेटा
वो नहीं होता जिसे माँ-बाप जन्म देते हैं, असली सपूत तो वो होता है जो
बुढ़ापे में माँ-बाप की सेवा करता है। चुटकी लेते हुए संतश्री ने बहुओं से
कहा कि आप सब कुछ पीहर से लेकर आईं, पर क्या पति को भी दहेज में पीहर से साथ लेकर आई थीं अगर नहीं तो जितने साल का पति आपको मिला है उतने साल तक
सास-ससुर को निभाने का बड़प्पन अवश्य दिखा दिजिएगा। आज आपने उन्हें भाग्य भरोसे छोड़ रखा है सोचो, उन्होंने भी तुम्हे जन्म देते ही भाग्य भरोसे छोड़ दिया होता तो आज तुम किसी अनाथालय में पल रहे होते। जब हमने पहली साँस ली
तो हमारे साथ माँ थी इसलिए हमारा यह दायित्व है कि जब उसकी अंतिम साँस निकले तो हम उसके पास हो।
रिश्तों में प्रेम और त्याग के बीज बोएं-संतश्री ने कहा कि अगर घर के लोग
लकड़ी के गठ्ठर की तरह साथ-साथ रहंगे तो दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें
हिला नहीं पाएगी, पर वे लकडियों की तरह अलग-अलग हो गए तो पड़ोसी भी उन पर हावी हो जाएगा। आज रिश्तों में प्रेम, भाईचारा और त्याग के बीजों को बोने
की जरूरत है ताकि परिवार में आनंद की फसलें लहलहा सके। चुटकी लेते हुए
संतश्री ने कहा कि आजकल सास-बहू में न बनने के कारण बेटे माँ-बाप को
गाँवों में रखने लगे हैं। घर में माँ का कहीं अतापता नहीं और लोग घर का
नाम मातृछाया रखते हैं। वे लोग नाम बदलकर पत्नीछाया रख दे। जिस घर पर पत्नी के अलावा किसी की छाया नहीं पड़ती उस घर का नाम मातृछाया रखने का क्या मतलब?हम सब साथ-साथ है का नारा अपनाने की सीख देते हुए भाई-भाई के साथ का जो सुख है वह तो स्वर्गलोक में भी नहीं है। अगर एक तरफ मंदिर की
प्रतिष्ठा में 5 लाख का चढ़ावा बोलना हो और दूसरी तरफ कमजोर भाई को
व्यापार के लिए 5 लाख का सहयोग करना हो तो पहले भाई की सहायता कीजिएगा क्योंकि ऊपरवाला चढ़ावे से नहीं भाई का सहयोग करने से खुश होगा। समाज को जोड़ने वाला सच्चा संत-संतश्री ने कहा कि जो समाज को जोड़े वही
सच्चा संत है। तोडने वाला कभी सच्चा संत नहीं हो सकता। हम समाज में ऐसे संतों को बार-बार बुलाए जो एकता में विश्वास रखते हो। हम समाज को नारंगी की बजाय खरबूजा बनाएं जो बाहर से भले ही अलग दिखाई देता है, पर छिलके उतरते ही एक हो जाता है। उन्होंने कहा कि हुबली में जो धार्मिक समरसता का जो माहौल बना है, उसे देखकर हम अभिभूत हैं। भगवान करे इसे कभी नजर न लगे। घर को स्वर्ग बनाए का भजन सुनाया- जब संतप्रवर ने आओ, कुछ ऐसे काम करें जो घर को स्वर्ग बनाएं, हमसे जो टूट गए रिश्ते हम उनमें साँध लगाएं, हम अपना फर्ज निभाएं भजन सुनाया तो सत्संगप्रेमियों का हृदय भीग उठा। प्रवचन से प्रेरित होकर हजारों युवाओं ने प्रतिदिन माता-पिता को प्रतिदिन पंचांग
प्रणाम करने का संकल्प लिया।
इससे पूर्व कार्यक्रम की शुरुआत मुनि शांतिप्रिय सागर महाराज ने सामूहिक
प्रार्थना से करवाई। इस अवसर पर लाभार्थी रमेश जी बाफना, दादावाड़ी के
प्रकाश जी छाजेड़, दिनेश जी संघवी, रतिलाल भाई जैन, सम्पतराज जी कटारिया,कोटूर संघ अध्यक्ष बाबूलाल जी बाफना, रामकृष्ण जी पालेकर, पारसमल जी
मांडोत, बाबुलाल जी मुणोत गोल्ड जिम परिवार, पूना के गुरुभक्त विशाल जीलोढ़ा एवं श्रीपाल जी छाजेड़ और बागलकोट संघ के सदस्यों ने दीप प्रज्वलित किया।

पैदल विहार: एक अनुचिंतन
By -डॉ मदन मोदी
पैदल विहार पर यूं तो शास्त्रों में बहुत गहन चर्चा है, किन्तु आम व्यक्ति इसके महत्व को समझ सके, इसके लिए मैं बहुत ही साधारण बातें यहां प्रस्तुत कर रहा हूं, ताकि विमान यात्रा व कार-ट्रेन से विहार-यात्रा की बात कर रहे लोग भी समझना चाहें तो समझ सकें और अपना विवेक जागृत कर सकें। -डॉ. मदन मोदी
हमारे यहां त्यागमय जीवन की प्रधानता है और त्याग में धर्म माना है।
जो पैदल विहार करते हैं, जिनके मन में किसी अंचल या वस्तु विशेष को लेकर कोई आसक्ति नहीं होती, वे साधु होते हैं। वे चलते ही इसलिए हैं कि मन में जन्म-जन्मांतरों से घर किए बैठी जो आसक्तियां हैं, सुविधा-भोग की जो प्रवृत्तियां हैं,उनकी जडें किसी तरह ढीली की जाएं, उन्हें हिलाया जाए।
पांव-पैदल चलने में यही होता है। वस्तु-स्वरूप समझ में आता है। दुनिया और दुनियादारी दोनों को नजदीक से देखने का मौका मिलता जाता है। संसार की असारता का भान होता है, त्याग-वैराग्य की जडें मजबूत होती है।
बात यह है कि जो भी जल्दबाजी में होता है, वह अपच की ओर ले जाता है। उसमें अपूर्णताएं रह जाती हैं। जो लोग आहिस्ता;किन्तु पुख्ता शैली में स्थितियों को पकडते हैं,उन्हें उन स्थितियों की समीक्षा में काफी सुविधा होती है।
"चरैवेति चरैवेति"
की स्थिति में बहुत कुछ हासिल होता है, लेकिन हवाई उडान से नहीं। गतिशीलता का ज्ञान और ताजगी, निर्मलता और स्वास्थ्य से गहरा संबंध है; किन्तु विमान की गति से नहीं, पैदल गतिमान रहने से। विमान द्वारा तेज चलने और कुछ भी न पाने में कोई तुक नहीं है। देखा गया है कि प्रायः जो लोग भागमभाग की जिन्दगी जीते हैं, वे खिन्न और क्षुब्ध रहते हैं। उनकी लिप्सा/जिज्ञासा लगभग मर जाती है। मार्ग का तो वे कुछ ले नहीं पाते। एक बिंदु से दूसरे बिंदू तक दौडना और कुछ भी न पाना कोई यात्रा है? यात्रा की तो सफलता ही इसमें है कि जितना अधिक बने अपने अनुभव के खजाने में डाला जाए और जितना अधिक व गहरा जाना जा सके, जाना जाए।
आँख मूँद कर विमान से एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक जाना जादू तो हो सकता है, जिन्दगी नहीं हो सकता। जिन्दगी और जादू में काफी फर्क होता है। जादू चौंकाता है, जिन्दगी यथार्थ/हकीकत की आँखें उघाडती है। चलकर ही सत्य तक पहुंचा जा सकता है, तेज चलने में सत्य तो क्या अर्द्धसत्य तक पहुंच पाना भी संभव नहीं होता। श्रमण जो पैदल चलते हैं, वे मात्र जीवन की सच्चाई तक गहरी पकड बनाने और यांत्रिक हिंसा के पाप से बचने के लिए,क्योंकि उन्होंने अहिंसा का संकल्प लिया है। वे जब पैदल चलते हैं,उनकी करुणा से, उनकी भावना से उत्सर्जित तरंगें कितने जीवों को त्राण देती है, जिनका वैज्ञानिक-मनोवैज्ञानिक आंकलन आज आसानी से किया जा सकता है।सुविधाओं का कोई अंत नहीं है। एक सुविधा की पीठ पर चढकर दूसरी सुविधा आ धमकती है। एक शिथिलता दूसरी शिथिलता को बटोर लाती है। हम अपनी अनुकूलताओं के अनुसार परिभाषाएं बनाने-बदलने लगते हैं। क्या आप चाहते हैं कि व्रती/संकल्प का धारक अपने निर्धारित मार्ग से विचलित हो जाए?
दो स्थितियां हैं- साध्य और साधन। यदि हमें साध्य की पवित्रता को कायम रखना है तो साधनों को भी निर्मल/निष्कलुष रखने की जरूरत है। निर्मलता जब भी हो, जहां भी हो,उसे शत-प्रतिशत होना चाहिए। लोगों का ध्यान साध्य पर तो होता है,किन्तु साधन को वे भुला बैठते हैं। यह आधुनिक समाज का दुर्भाग्य है। साधु के लिए यह अपरिहार्य है कि वह साध्य और साधन दोनों की पावनता पर ध्यान दे।
मेरे विचार में यह तभी संभव है जब साधु दीन-दुनिया का अनुभव करे। पांव-पग घूमे और पैदल विहार में रस ले। उसे ग्रहण और त्याग की तात्कालिकताओं का अनुभव करना चाहिए। जब तक वह संयोग-वियोग को उनकी आत्यंतिक तीव्रताओं में महसूस नहीं करेगा, तब तक आसक्तियों को वह घटा नहीं सकेगा।
ज्ञान का और गति का गहरा संबंध है। ज्ञान के सारे पर्याय शब्द गत्यर्थक हैं। आगम,निगम, अधिगम,अवगम; सब में "गम्"धातु बिराजमान है। आगम का अर्थ है विज्ञान, प्रमाण, ज्ञान;निगम का अर्थ है पवित्र ज्ञान, आप्रवचन,प्रामाणिक कथन;अधिगम का अर्थ है सम्यक अध्ययन, या ज्ञान और अवगम के मायने हैं समझ,अंडरस्टेंडिंग। इस तरह ज्ञान गतिमय है और गति ज्ञानमय, लेकिन विमान की गति नहीं,पैदल विहार की गतिकता। साधु की यह गतिकता रुकेगी तो उसके ज्ञान की,भेदविज्ञान की तलवार जंग खा जाएगी।
जहां तक सवाल विहार के दौरान होने वाले हादसों का है तो यह जिम्मेदारी हम श्रावक-श्राविकाओं की है कि हम अपने पूज्य साधु-साध्वी भगवंतों का सुरक्षित विहार करवाएं। एक स्थान के भाई-बहिन छोड़ने जाएं और अगले स्थान के भाई-बहिन सामने से लेने आएं। हम इसे अपनी प्राथमिक जिम्मेदारी समझें।

जैन साधु दीक्षा क्यों लेता है?
By - साध्वी प्राग्भा विराट
‘सड़क हादसे में हुई जैन साधु अथवा साध्वियों की दर्दनाक मौत’ समाचार-पत्रों में ऐसे हेड लाईंस कुछ समय तक मीटिंगों, चर्चाओं, चिंताओं, थोथी घोषणाओं का विषय तो बनते हैं लेकिन परिवर्तन का हेतु नहीं बनते। निरंतर बढ़ती जा रही ऐसी घटनाओं पर सावधानतापूर्वक रोक लग सके, ऐसे प्रयास नदारद है। विहार यात्रा में सड़क दुर्घटना को टालने के लिए वैकल्पिक उपायों की लिस्ट निरंतर बढ़ती जा रही है, लेकिन उनमें से अधिकांशत Imprectical ही साबित होते हैं। साधु-साध्वियों के लिए ‘हाईवे पर फुटपाथ बनाने की माँग हो’ या फिर ‘विहार सेवा दे रहे श्रावको की संख्या बढ़ाने’ व ‘उन्हें रेडियम जैकेट या छड़ी लेने’ की बात हो.....ये सब उपाय सड़क दुर्घटना टाल पाएँगे, ऐसा लगता नहीं है।
अभी हाल ही में भिवंडी-ठाणे मार्ग पर एक साध्वी व एक सेविका की असामायिक मृत्यु, एक साध्वी का मरणासन्न अवस्था में होना तथा एक सेविका का पैर कट जाना...ये ऐसी अपूरणीय क्षतियाँ हैं, जिसने जैन समुदाय को झकझोर कर रख दिया है। ऐसी घटनाओं से जैन समाज को निश्चित रूप से समय-समय पर रूबरू होना पड़ रहा है।
किसी अपेक्षा से साधु-साध्वी एक सामाजिक संपत्ति भी तो है। अतः उसकी देखभाल करना समाज व चतुर्विध संघ का दायित्व भी तो है। साधु के लिए विहार यात्रा जहाँ उसकी ईर्या समिति साधना है, वहीं विहार यात्रा प्रवास के दौरान जिज्ञासुजनों को बोध देना, उसका दायित्व। आज जिस तरह लंबी-लंबी विहार यात्राएँ हो रही है, कि.मी. का ग्राफ बढ़ाने की जो होड़ लगी है, उपर्युक्त दोनों चीजों का पालन होता हो...ऐसा कहीं दृष्टिपात नहीं होता।
वाहनचर्या में एकेन्द्रय की विराधना होती है लेकिन ऐसी दुर्घटनाओं में तो दिवंगत पंचेन्द्रियों के साथ-साथ संबंधित अनगनित पंचेन्द्रियों के प्राणों का अतिपात हो जाता है....इस दिशा में हमारे गुरू भगवंतों व वरिष्ठ सावकों का ध्यान कब जाएगा...इसकी प्रतीक्षा है।
‘जैन साधु वाहनचारी नहीं है’ इस नियम की पालना के लिए बनाए जा रहे विहार धाम...साथ चल रहा वाहन...व्हील चेयर धकेलने वाले सेवक-सेविका की (अमानवीय) सेवा...आदि पर हो रहा आर्थिक व्यय-क्या सोचनीय नहीं है? ऐसे में एक वरिष्ठ साधु द्वारा ‘जैन समाज के साधु भगवंतों के लिए संपूर्ण भारत वर्ष में हाईवे पर अतिरिक्त रोड बनवाने की मांग’ क्या हास्यास्पद नहीं है?...अप्रायोगिक नहीं है?
व्यक्तिगत साधना हेतु एक नियम की पालना में लग रहे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दोष व आर्थिक व्यय की ओर ध्यान देना न केवल एक साधक के लिए वरन् संपूर्ण चतुर्विध संघ के लिए अति आवश्यक है।
इसी के साथ एक और विचारणीय विषय की ओर ध्यान जाता है। ऐसे हादसों की खबर मिलने के पश्चात् रूग्ण, अशक्त व वृद्ध हो रहे साधु-साध्वी भगवंतों की साधना कपेजनतइ होती है। उनसे अंतरंग बातचीत में उनके भीतर पनप रहे भय व असुरक्षा ने हमें सोचने पर मजबूर कर दिया कि-‘जैन साधु दीक्षा क्यों लेता है।’ ‘उसकी priority क्या है?’ समाचारी के नियमों की पालना या आत्मसाधना? कुछ दिनों पहले एक संप्रदाय में भीषण गर्मी और तीव्र ज्वर से पीड़ित एक नवदीक्षिता साध्वी ने दीक्षा के मात्र पाँच दिनों बाद आर्त्तध्यान में दम तोड़ा। कारण-गुरू आज्ञा से नियम पालना की प्रतिबद्धता। क्या जैन साधु समाचारी इतनी अमानवीय है? ऐसे प्रश्न पूछे जाने पर महावीर के कर्म-सिद्धांत का उथला ज्ञान रखने वाले ‘स्वघोषित ज्ञानी’ कर्म की दुहाई देते हैं। क्या ऐसे में हम नई पीढ़ी में धर्म के प्रति उदासीनता, नकारात्मकता व भय को प्रश्रय नहीं दे रहे हैं?
हम इस बात से भी इंकार नहीं करते कि समाचारी में विशेष परिस्थितियों के लिए किए गए बदलाव कई सुविधा-भोगी साधुओं को स्वच्छन्दता की राह पर अग्रसर कर देंगे। ‘असाधकों को ज़बर्दस्ती साधक बनाने की धुन अधिक आवश्यक है’ या ‘साधक आत्माओं की मुक्ति यात्रा में सहयोग अपेक्षित है’-इस दिशा में विवेकपूर्ण निर्णय लेना आचार्य, उपाध्याय व पदाधिकारी संतों का दायित्व है। आखिर एक साधु उन्हीं के भरोसे पर ‘संघस्थ’ होना स्वीकार करता है...वरना तो साधक एकल विहारी भला।
इन ज्वलंत प्रश्नों का मात्र उत्तर देना ही समस्या का समाधान नहीं है, बल्कि युगानुकुल समीचीन निर्णय लेना समय की मांग है। ‘चरम-मंगल’ ऐसे युगांतरकारी समयानुकूल परिवर्तनों का हितेच्छु है। साधक आत्माएँ आत्म साधना पथ पर निरंतर गतिमान रहे-यही सदाशा...!!

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