25.08.2017 ►Media Center Ahinsa Yatra ►News

Posted: 25.08.2017
Updated on: 15.11.2017

2017.08.21 Kolkata Chaturmas 32

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News in Hindi:

अहिंसा यात्रा प्रेस विज्ञप्ति
एक बिन्दु पर मन को केन्द्रित करना है ध्यान: आचार्यश्री महाश्रमण
-ध्यान के चार प्रकारों की आचार्यश्री ने की विस्तृत व्याख्या
-ध्यान दिवस के रूप में आयोजित हुआ पर्युषण पर्वाराधना का सातवां दिवस
-‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के अंतिम पड़ाव पहुंचे आचार्यश्री
-ब्रह्मचर्य पर साध्वीवर्याजी का हुआ उद्बोधन तो मुख्यमुनिश्री ने गीत का किया संगान
25.08.2017 राजरहाट, कोलकाता (पश्चिम बंगाल)ः जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा के प्रणेता, अखंड परिव्राजक, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी के पावन सान्निध्य में कोलकाता के राजरहाट क्षेत्र में नए तीर्थस्थल के रूप में स्थापित ‘महाश्रमण विहार’ में पर्युषण महापर्व को आध्यात्मिक उत्साह और उल्लास के मनाया जा रहा है। भव्य आराधना के देश भर से श्रद्धालु अपने आराध्य के सन्निधि पहुंचे हुए हैं। सूर्योदय के कुछ पूर्व से लेकर देर रात तक मानों चारों एक आध्यात्मिक वातावरण से बना हुआ है। हर कोई तपस्या, ध्यान, साधना, उपासना, व्रत, स्वाध्याय आदि में लगा हुआ अधिक से अधिक इस पर्वाराधना से अपनी आत्मा के कल्याण का प्रयास करता नजर आ रहा है। सभी के आध्यात्मिक उत्थान के प्रेरणास्रोत आचार्यश्री महाश्रममणजी बने हुए हैं।
    शुक्रवार पर्युषण पर्वाधिराज का सातवां दिन रहा और पर्व के सातवें दिन को ध्यान दिवस के रूप में आयोजित किया गया। महाश्रमण विहार स्थित अध्यात्म समसवसरण से अध्यात्म जगत के पुरोधा, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी ने श्रद्धालुओं को ध्यान के बारे में पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि आदमी का मन चंचल होता है, उसे एक स्थान पर केन्द्रित करना कठिन काम होता है। ध्यान के माध्यम से आदमी अपने चंचल मन को एक स्थान या एक बिन्दु पर केन्द्रित कर सकता है। आचार्यश्री ने ध्यान शब्द का विवेचन करते हुए कहा कि ध्यान का अर्थ होता है चिन्तन, एकाग्र हो जाना अर्थात् एक बिन्दु पर केन्द्रित हो जाना। ध्यान के चार प्रकार बताते हुए आचार्यश्री ने कहा कि आदमी जब किसी प्रिय व्यक्ति या वस्तु के वियोग तथा अप्रिय के संयोग में आता है तब भी उसका ध्यान केंद्रित होता है इसे आर्त ध्यान कहते हैं, किन्तु यह ध्यान छोड़ने लायक है। उसी प्रकार एक निष्ठुर आदमी हिंसा, चोरी, मारकाट और झूठे काम करने के लिए भी अपना ध्यान केन्द्रित करता है तो उसे रौद्र ध्यान कहते हैं। यह ध्यान भी छोड़ने लायक है। आदमी को धर्म ध्यान करने का प्रयास करना चाहिए। आचार्यश्री ने धर्म ध्यान के तीन प्रकार मानसिक, वाचिक और कायिक का भी भेद बताते हुए आदमी को धर्म ध्यान करने की पावन प्रेरणा प्रदान की। चतुर्थ ध्यान शुक्ल ध्यान के बारे में आचार्यश्री ने कहा कि यह बहुत ही ऊंचा ध्यान की स्थिति है। इसलिए आदमी को धर्म ध्यान करने का प्रयास करना चाहिए। अपनी काया, वाणी और मन से आदमी को ध्यान करने का प्रयास करना चाहिए। मन से विचार और कल्पनाओं को विराम दें, वाणी को एक घंटे मौन रखकर ध्यान लगाने का प्रयास करें तथा शरीर को एक मुद्रा मंे स्थिर कर ध्यान करने का प्रयास किया जा सकता है।
    आचार्यश्री ने अपने मुख्य प्रवचन के उपरान्त चल रही ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के अंतिम भव में पहुंचे आचार्यश्री ने राजर्षि नन्दन के भव के वर्णन के उपरान्त भगवान महावीर के वैशाली क्षेत्र के प्रथम ब्राह्मणी के गर्भ के आने की कथा तथा बाद में राजा सिद्धार्थ की पत्नी त्रिशला के गर्भ में जाने का विस्तार से वर्णन किया। आचार्यश्री ने आने वाले संवत्सरी पर्व के दिन लोगों को व्रत करने की पावन प्रेरणा प्रदान की तो वहीं बालमुनियों को भी इस व्रत का जागरूकता पूर्वक पालन करने की पावन प्रेरणा प्रदान की।
    दस श्रमण धर्मों में अंतिम श्रमण धर्म ब्रह्मचर्य पर साध्वीवर्याजी ने लोगों को प्रेरक वक्तव्य दिया तो मुख्यमुनिश्री ने गीत के माध्यम से लोगों को ब्रह्मचर्य का पालन करने के लिए उत्प्रेरणा प्रदान की।

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