09.10.2017 ►Acharya Shri VidyaSagar Ji Maharaj ke bhakt ►News

Posted: 09.10.2017
Updated on: 11.10.2017

Update

Please help us.. आचार्य श्री विद्यासागर जी महारजा के प्रवचनों की DVD कहा से मिल सकती हैं? हमें प्रवचन सुनने के लिए चाहिए.. 10-20-50 जितनी भी DVD प्रवचन मिल सके हमें चाहिए.. अगर कोई बता सकता हैं तो pls reply... किसी भी विषय पर प्रवचन हो चलेंगे!! #AcharyaVidyasagar

सब्जी जैसी सामान्य चीज़ खरीदते समय तो हम देख परख कर पैसे देते हैं लेकिन जिनेन्द्र भगवान् का स्वरूप को समझते समय हम इतनी बड़ी भूल कैसे कर डालते हैं? क्षुल्लक ध्यानसागर -शिष्य आचार्यविद्यासागर G #AcharyaVidyasagar #KhsullakDhyansagar

🔶 भ्रांति 1:- "वीतराग भगवान् कुछ भी लेते-देते नहीं हैं" क्या यह सत्य है?

यह बिल्कुल आगम विरुद्ध कथन है। इसमें आधी बात सच है की भगवान कुछ लेते नहीं पर जिनके पास 9 क्षायिक लब्धियाँ हैं और जिनके अंदर क्षायिक दान लब्धि जगमगा रही हो उनको अदाता कैसे कहा जा सकता है? आचार्य कुन्द कुन्द स्वामी ने बोधपाहुड की गाथा 24 में कहा है...

❓अरहंत देव कौन है? देव वो होते है जो देते हैं। देव वो हैं जो भली प्रकार से देते हैं।

❓देव क्या प्रदान करते है? उनके पास क्या है? यदि भगवान् की दीक्षा-अवस्था का स्मरण करेंगे तो तब उनके पास कुछ भी नहीं होता पर भगवान् की केवली-अवस्था का स्मरण करेंगे तब उनके पास सब कुछ होता है। यहाँ आचार्य कुन्द कुन्द स्वामी के कथन अनुसार जिसके पास होता है, वही देता है, भगवान धर्म-अर्थ-काम-ज्ञान-दीक्षा (शरण) सबके प्रदाता है।

🙏 श्री धवला जी ग्रन्थ में भी आचार्य वीरसेन स्वामी ने लिखा है..." जो देवे सो देव, जो न देवे वो काहे का देव?"

🌟 भगवान् को बुद्धि द्वारा जानने से पहले श्रद्धा से जानिए, समझिए तो कल्याण होगा क्योंकि आजतक छद्मस्थ अवस्था में किसी के पास इतनी बुद्धि ही नहीं रही कि भगवान को समझ सके।

✨ "केवली को जानने के लिए केवली बनना पड़ता है।"

✨ "ज्ञानवरण के परदे के अंदर से केवली की पहचान दुष्कर है।"

✨ केवली भगवान् भी ख़ुद अरहंत का स्वरुप पूर्ण नहीं बता पाए तो फिर अपन तो कितने छोटे हैं अपन क्यों बड़े बन रहे हैं?..... छोटे बन जाएँ तो ज़ल्दी कल्याण हो जाएगा।

➡️ भगवान् दाता नहीं, महादाता है। वो धर्म देते हैं, अर्थ आदि देते हैं तो कैसे देते है?

➡️ युक्ति:-कल्पवृक्ष के समान।
कल्पवृक्ष जिस प्रकार उससे जो मांगो वह सब कुछ प्रदान करता है "जाँचे सुरतरु देय सुख" क्योंकि उसका स्वरूप ही वैसा है।
बस उसी प्रकार जैसा की सिद्धान्त-ग्रन्थ जयधवला के रचियता आचार्य जिनसेन स्वामी आदिपुराण में कहते है कि... "कल्पवृक्षो वरप्रदः" आदिनाथ भगवान् को इन्द्र कल्पवृक्ष कह रहा है और इन्द्र जो कि सर्व ऐश्वर्य संपन्न होता है उसके लिए आदिनाथ भगवान कल्पवृक्ष हैं तो सामान्य मनुष्य को तो वो क्या-क्या प्रदान कर सकते हैं इससे हम अनुमान लगा सकते हैं कि वो भगवान कितने बड़े दाता हैं!

"अपुत्रीन को तू भले पुत्र कीने" कविवर द्यानतराय जी ने भी आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी का ही अनुकरण किया है। इसीलिए अरहंत प्रभु को अदाता कह ही नहीं सकते। अदाता कहना भगवान की निंदा हो जाएगी और निंदा करने वाले का कभी कल्याण नहीं हो सकता। भगवान् की स्तुति करनेवाला तो उनके समान बन जाता है और जो सेवक को स्वामी न बना सके उस स्वामी के पास मैं क्यों जाऊँ? "अरहंतसरणं पव्वज्जामि"

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Update

क्या मोक्ष जाने का एकाधिकार सिर्फ जैनियों का ही हैं? #Be_Logical Amazing Answer by #MuniSudhasagar G -सिर्फ जैनी मोक्ष नहीं जा सकता बल्कि जिसने राग राग द्वेष कामादिक जीते सब जग जान लिया.. सब जीवो को मोक्ष मार्ग का नित्य ही उपदेश दिया.. @ कहा लिखा हैं इसमें महावीर का नाम? शर्त हैं जिनके गुरु भगवन राग द्वेष जित लेवे वे मोक्ष चले जायेंगे.. जैन धरम में किसी व्यक्ति को या जाती को मोक्ष नहीं हैं.. जो भी सम्यक को अपनाता हैं वही मुक्त हो सकता हैं.. जो भी आचरण को अपनाता हैं वही मोक्ष जाता हैं.. wonderful answer listen complete..:) #Share #AcharyaVidyasagar

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News in Hindi

अन्यत्व भावना ~ this Bhavana reflects the fact that the body is separate to the soul ~ जल नहीं पावे प्राण गमावे भटक भटक मरता, वस्तु पराई माने अपनी, भेद नहीं करता! रूप तुम्हारा सबसो न्यारा भेद ज्ञान करना, जो लो पुरुष थके ना तो लो उद्यम सो चरना #Worthy_Read

As time passes, the body will age and decay. Eventually, it will perish. However, the only thing which is imperishable is the soul. The soul is the embodiment of consciousness. For this reason we shouldn’t get attached to the body that we are born into as it will not come with us in our next birth.

This applies to the relationships that the body identifies with. They are separate to the soul. They are not everlasting! In one lifetime we may be the parent of a being. However, in another lifetime we could be a sibling to the same being. Therefore we should not be attached to the body or the relationships that the body can identify with. We also need to refrain from indulging in the passions of the physical body, through emotions, such as, greed, anger, ego or lust.

Mahavir Bhagwan experienced 34 significant births prior to liberating his soul. His soul was born into different gatis. Every time his life ended, the body perished and the soul was born into a new form with a different body. For this reason, we should not be attached to the body as it is not ours. As our soul moves from one life form to another our body will not.

Now the bliss in this understanding is all to do with the human birth. Through the human birth one can attain Moksha. This gives us freedom from pain, suffering, greed, lust, ego, loss and much more. So let’s focus on the soul, rather than, the body and let’s empower the soul so that we can be rid of birth, death and rebirth.

SOURCE INFO - Article Explanation by Heena Modi - Big thanks to her for the amazing text. Lord Bahubali aka Gomateshwara 57 feet monolith Idol @ Shravanabelagola dates from 978-993 AD [ On August 5, 2007, the statue was voted by Indians as the first of Seven Wonders of India.]

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