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Posted: 12.02.2018

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भगवान को भगवान ही रहने दो
-डॉ. आशीष जैन आचार्य
संदर्भ - विध्रहर, शांतिप्रदायक, संकटहर, संकटमोचन, शनिग्रहनिवारक आदि उपाधियों और विशेषणों से भगवान को कत्र्तावाद के चक्रव्यूह से बाहर रखने का विनम्र निवेदन हेतु प्रस्तुति।
जैनदर्शन कर्म प्रधान है। जैनदर्शन कभी भी अपने सिद्धान्तों, नियमों और आचार-संहिता से कोई समझौता नहीं करता है। यही कारण है कि आज जहाँ देश-विदेश में बौद्धधर्म की स्थापना है, वहीं जैनधर्म की स्थापना सहज ही हो सकती थी, परन्तु जैनदर्शन ने अपने सिद्धान्तों के साथ कभी समझौता नहीं किया। एक ओर जहाँ जैनदर्शन प्रभावना की बात करता है, वहीं दूसरी ओर प्रचार-प्रसार और लोगों को अपने प्रति रिझाने वाली बातों से परहेज करता है। जैनदर्शन व्यक्तित्ववाद पर नहीं चलता है, जैनदर्शन गुणवाद पर चलता है। यहाँ व्यक्ति की पूजा नहीं है, यहाँ गुणों की पूजा है। जो वीतरागी, सर्वज्ञ और हितोपदेशी इन तीन गुणों का धारी है, उसी को भगवान कहा है और वही भगवान हमारे आत्मकल्याण में प्ररेणीय और अनुकरणीय है। उस भगवान को चाहे हम आदिनाथजी के रूप में स्मरण करें या फिर महावीरजी के रूप में या फिर अनंतवीर्यजी के रूप में। सभी समान गुणों को लिये हुये हैं। सभी का स्मरण, पूजन, आराधना और स्तवन समान फल को देने वाला है।
ऐसे में हम वर्तमान में देख रहे हैं कि आज भगवान को हमने विभिन्न उपाधियाँ और विशेषणों के कत्र्तावाद में बाँध दिया है। जैनदर्शन ने तो कत्र्तावाद को कहीं से कहीं तक स्वीकार नहीं किया और न ही कत्र्तावाद को तर्क और आगम से सिद्ध किया जा सकता है। फिर भी आज हमने भगवानों को बाँटा है। भगवान शांतिनाथ शांति को देने वाले हैं, भगवान मुनिसुव्रत नाथ शनि अरिष्टग्रहनिवारक है, भगवान पाश्र्वनाथ संकट हरने वाले हैं, विध्नहर है आदि-आदि। आश्चर्य तो इस बात का है कि आज वे भी इन बातों का प्रचार कर रहे हैं जो इस विषय की शिक्षा देते हैं कि जिनेन्द्र भगवान का नाम मात्र ही पापों का क्षय करने वाला है। फिर भिन्न-भिन्न प्रकार से उनके आगे और पीछे इस प्रकार के टाइटल देकर लोगों को भ्रमित किया जा रहा है। ऐसा माना जाता है कि भगवान मुनिसुव्रतनाथजी की पूजा शनिवार को करने से शनिग्रह की शांति होती है। तो क्या भगवान मल्लिनाथजी की पूजन शनिवार के दिन करने से शनिग्रह जो आपकी कुण्डली में बैठा वो शांत नहीं होगा? सोचिये।
हम भगवान को कत्र्ता क्यों मान रहे हैं? भगवान तो हमारे लिये उदाहरण है कि अगर आपको ऐसा बनना है तो आप को भी परिश्रम और साधना करनी पड़ेगी। जिनेन्द्र देव के दर्शनों का और आराधना का फल तो परम्परा से मोक्ष है, सांसारिक सुख तो स्वयमेव आ जाते हैं। परन्तु सांसारिक सुखों की पूर्ति के लिये चौबीस में किसी तीर्थंकर विशेष की पूजा अपनी सांसारिक उपलब्धि के लिये की जाये। ये ठीक नहीं लगता है। इस कुचक्र से बाहर आना चाहिये। हम चौबीस भगवान की पूजा २४ दिनों में प्रतिदिन एक-एक की करके कर सकते हैं। या जिस दिन मन जिस भगवान की पूजा करने का है, उसकी पूजा करें। परन्तु यह मानकर कदापि न करें कि शांतिनाथ भगवान की पूजा करने से शांति मिलेगी और पाश्र्वनाथ भगवान की पूजा करने से संकट दूर होंगे। यह ठीक नहीं है। जिनेन्द्र भगवान के गुणों का गान करना है, उनकी स्तुति करनी है और उनके जैसा हमें बनना है इसलिये उनकी आराधना करना है न कि सांसारिक उपलब्धियों के लिये। वे तो स्वयमेव मिलेगी।
यह लेख लिखने के लिये प्रेरणा सिर्फ इस बात से मिली कि एक श्रावक ने कहा - पण्डितजी! कल भगवान मुनिसुव्रतनाथ का मोक्षकल्याणक है, मंदिरजी में अभिषेक-पूजन और महाआरती सामूहिक रूप से करेंगे। तो एक छोटी-सी सूचना कागज पर बनायी गयी। तब वह श्रावक बोलता है कि - भगवान मुनिसुव्रतनाथजी के आगे विध्रहर लिखे। मैंने कहा- ऐसा क्यों? बोला - फलाने-फलाने महाराज बोलते हैं। मैंने कहा- आवश्यकता नहीं है। भगवान का नाम ही काफी है। परन्तु उसकी जिद थी क्योंकि महाराज ने कहा था। आश्चर्य होता है कि हमें जो शिक्षा इस बात की देते हैं कि कत्र्तापने और व्यक्तिवाद की चर्चा से जैनदर्शन का कोई संबंध नहीं है और वही इस प्रकार से कार्य करने के लिये प्रेरित करे। खैर।
एक बार आचार्यश्री विशुद्धसागरजी महाराज ने प्रवचन के दौरान पूछा- बताओ! भगवान आदिनाथ से लेकर भगवान महावीर तक और सूर्य, चन्द्रमा, शनि आदि ग्रह, इन दोनों में शाश्वत कौन है? सहजता के साथ लोगों ने उत्तर दिया - भगवान आदिनाथजी से भगवान महावीर तक के तीर्थंकर शाश्वत है। तब महाराजश्री बोले - नहीं, ये तीर्थंकर तो अशाश्वत है, इनके पहले भी चौबीस तीर्थंकर थे, आने वाले भी चौबीस है और कितनी चौबीस हो गई और आगे होगी? ये एक निश्चित काल के लिये है, फिर दूसरे नाम वाली चौबीस होगी। परन्तु सूर्य, चन्द्रमा, शनि आदि ग्रह पहले भी ऐसे ही थे और आज भी ऐसे ही है। इनमें कोई परिवर्तन न हुआ है और न होगा। फिर आप कैसे कह सकते हैं? कि भगवान मुनिसुव्रतनाथजी शनिग्रह निवारक है, भगवान पाश्र्वनाथ संकटमोचन है आदि-आदि। आपका यह कथन दूषित है। ऐसा कहना, करना और कराना- ये सब श्रेष्ठ नहीं है। इससे स्वयं बचे और अन्य को भी प्रेरणा दें।
हम भगवान को बाँटे न। जिनेन्द्र भगवान हमारे लिये इस विषय के प्रतीक है कि हम भी ऐसे ही जिनेन्द्र बन सकते हैं। जिनेन्द्र भगवान राग-द्वेष और मोह को छोडक़र संसार और शरीर से विरक्त हुये हैं। हम कत्र्तावाद और ईश्वरवाद को बढ़ावा न दे। सामान्य-सी बात समझें - कोलकाता का प्रसंग है। बेलगछिया में मुनिश्री प्रसन्नसागरजी महाराज विराजे थे, उनके पास महाराष्ट्र के कुछ श्रावक पहुँचे, उन्होंने प्रश्र किया- महाराजश्री! देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करना चाहिये या नहीं, आज हमारे यहाँ यही विवाद चल रहा है, इसके लिये समाधान दे। उनका उत्तर एक पंक्ति में था, परन्तु बड़ा ही अर्थपूर्ण था। उन्होंने कहा - जिनको संसार में रहना है, वो संसारी को पूजो और जिनको संसार छोडऩा है वो वीतरागी को पूजो। क्योंकि जैसा बनना हो, उसी का अनुशरण करो। संसारी संसारी का अनुशरण करेगा और वैरागी वीतरागी का अनुशरण करेगा।
महानुभाव! विचार करना। हम क्या बनना चाहते हैं? संसारी या मुक्त। हमें जैनकुल मिला, जिनेन्द्र भगवान के दर्शनों का सौभाग्य मिला, दिगम्बर मुनिराजों का दर्शनों का सौभाग्य मिला। ऐसे में हम कत्र्तावाद में उलझकर खुद का जीवन क्यों व्यर्थ करें? आओ आज से आप और हम एक नयी पहल करें- अब हम भगवान को भगवान ही रहने देंगे।
आयतस्तू:
(डॉ. आशीष जैन आचार्य)

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