12.06.2018 ►SS ►Sangh Samvad News

Posted: 12.06.2018
Updated on: 13.06.2018

Update

👉 ट्रिप्लीकेन, चेन्नई: तेरापंथ कन्यामण्डल द्वारा "ग्रूम युर पर्सनालिटी" एवं "पर्यावरण बचाओ" पर कार्यक्रम व प्रतियोगिता का आयोजन
👉 पूर्वांचल, कोलकाता: *प्रतिभा सम्मान समारोह आयोजित*..
✨ *महामहिम राज्यपाल श्री केशरीनाथ त्रिपाठी* थे मुख्य अतिथि..
👉 सेलम - सीखें स्वप्रबंधन सवारें अपना जीवन कार्यशाला
👉 कूचबिहार - तेयुप द्वारा वृक्षारोपण

प्रस्तुति -🌻 *संघ संवाद* 🌻

👉 *अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल के तत्वावधान में*
💥 *इंदौर - मध्यप्रदेश, ओडिशा व छत्तीसगढ़ स्तरीय आँचलिक कन्या कार्यशाला*

💥 *द्वितीय सत्र - एक नई पहचान भरे भीतर की उड़ान*

दिनांक - 12-06-2018

प्रस्तुति -🌻 *संघ संवाद* 🌻

👉 *अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल के तत्वावधान में*
💥 *अखिल भारतीय कन्या मण्डल के निर्देशन में*

💥 *मध्यप्रदेश, ओडिशा व छत्तीसगढ़ स्तरीय आँचलिक कन्या कार्यशाला पहचान का हुआ आगाज*

💥 *साध्वी श्री प्रबलयशा जी के सान्निध्य में*

💥 *अभातेमम अध्यक्ष कुमुद कच्छारा की उपस्थिति में*

दिनांक - 12-06-2018

प्रस्तुति -🌻 *संघ संवाद* 🌻

👉 गुवाहाटी - *असम राज्यपाल से अभातेमम अध्यक्ष* के नेतृत्व में प्रतिनिधि मंडल की मुलाकात

प्रस्तुति - 🌻 *संघ संवाद* 🌻

Video

👉 प्रेरणा पाथेय:- आचार्य श्री महाश्रमणजी
वीडियो - 12 जून 2018

प्रस्तुति ~ अमृतवाणी
सम्प्रसारक 🌻 *संघ संवाद* 🌻

👉 उदासर - *'शासन श्री' साध्वी श्री विजयश्री जी का देवलोकगमन*

🌀 साध्वी श्री का जीवन परिचय

प्रस्तुति - 🌻 *संघ संवाद* 🌻

News in Hindi

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जैनधर्म की श्वेतांबर और दिगंबर परंपरा के आचार्यों का जीवन वृत्त शासन श्री साध्वी श्री संघमित्रा जी की कृति।

📙 *जैन धर्म के प्रभावक आचार्य* 📙

📝 *श्रंखला -- 349* 📝

*मनस्वी आचार्य माणिक्यनन्दी और नयनन्दी*

परीक्षामुख ग्रंथ के रचनाकार आचार्य माणिक्यनन्दी दिगंबर विद्वान् थे। वे जैन न्याय के आद्य सूत्रकार थे। उनकी दार्शनिक प्रतिभा बेजोड़ थी। न्याय विषय पर उनका आधिपत्य था। नयनन्दी दिगंबर परंपरा के मनस्वी आचार्य थे।

*गुरु-परंपरा*

आचार्य माणिक्यनन्दी नन्दी संघ के थे। विंध्यगिरी के शिलालेखों में एक शिलालेख शक संवत् 1320 (ईस्वी सन 1398) का है। उसमें नन्दी संघ के आठ आचार्यों में एक नाम माणिक्यनन्दी का है। आचार्य माणिक्यनन्दी के प्रथम विद्या शिष्य नयनन्दी ने अपने 'सुदंसण चरिउ' नामक अपभ्रंश कृति की प्रशस्ति में गुरु परंपरा दी है। वह इस प्रकार है— सुनक्षत्र, पद्मनन्दी, विष्णुनन्दी, नन्दनन्दी, विश्वनन्दी, विशाखनन्दी, गणीरामनन्दी, माणिक्यनन्दी, नयनंदी आदि। उक्त गुरु परंपरा के अनुसार आचार्य माणिक्यनन्दी के गुरु जिनागम के विशिष्ट अभ्यासी तपस्वी गणीरामनन्दी थे। नयनन्दी आचार्य माणिक्यनन्दी के शिष्य थे।

*जीवन-वृत्त*

आचार्य माणिक्यनन्दी धारानगरी के निवासी थे। परमार नरेश भोज की सभा में वे विशेष सम्मान प्राप्त विद्वान् थे। न्यायशास्त्र के विद्यार्थी उनके चरणों में बैठकर न्याय विद्या का प्रशिक्षण पाते थे। न्याय विद्या के अधिकृत विद्वान् प्रभाचंद्र जैसे उनकी कक्षा के विद्यार्थी थे। 'सुदंसण चरिउ' जैसी उत्तम कृति के रचनाकार आचार्य नयनन्दी भी उनके प्रथम विद्या शिष्य थे।

माणिक्यनन्दी महान् स्वाध्यायी आचार्य थे। आचार्य अकलङ्क के न्याय ग्रंथों के गंभीर पाठी थे। प्रमेयरत्नमाला के रचनाकार लघु अनन्तवीर्य ने अपने ग्रंथ में लिखा

*अकलङ्कवचोऽम्भोधेरुद्दध्रे येन धीमता।*
*न्यायविद्यामृतं तस्मै नमो माणिक्यनन्दिने।।2।।*
*(प्रमेय रत्नमाला)*

आचार्य माणिक्यनन्दी को मेरा नमस्कार है। जिन्होंने अकलङ्क के साहित्य समुद्र का मंथन करके विद्या रूपी अमृत निकाला है।

आचार्य माणिक्यनन्दी के व्यक्तित्व से प्रभावित होकर विद्वान् अभिनव धर्मभूषण ने अपनी न्यायदीपिका नामक कृति में उन्हें भगवान् शब्द से संबोधित किया। आचार्य नयनंदी ने भी माणिक्यनन्दी को अपने ग्रंथ में महापण्डित और त्रैविद्य का संबोधन देकर उनके प्रति आदरभाव प्रकट किया था।

आचार्य माणिक्यनन्दी का वैदुष्य अतिशय प्रभावक था। आचार्य नयनन्दी भी संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश के अधिकारी विद्वान् थे।

*मनस्वी आचार्य माणिक्यनन्दी और नयनन्दी द्वारा रचित साहित्य* के बारे में पढ़ेंगे और प्रेरणा पाएंगे... हमारी अगली पोस्ट में... क्रमशः...

प्रस्तुति --🌻 *संघ संवाद* 🌻
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अध्यात्म के प्रकाश के संरक्षण एवं संवर्धन में योगभूत तेरापंथ धर्मसंघ के जागरूक श्रावकों का जीवनवृत्त शासन गौरव मुनि श्री बुद्धमलजी की कृति।

🛡 *'प्रकाश के प्रहरी'* 🛡

📜 *श्रंखला -- 3* 📜

*बहादुरमलजी भण्डारी*

*देवता नहीं मिला*

विजयसिंहजी मेहता जोधपुर राज्य के दीवान (प्रधानमंत्री) थे। उस समय बहादुरमलजी 'हजूरी दफ्तर' के अधिकारी (Personal Private Secretary) थे। राज्य की तत्कालीन पद्धति के अनुसार प्रधानमंत्री के आदेश भी 'हजूरी दफ्तर' की छाप लगने पर ही मान्य होते थे। मेहताजी के आदेश उक्त दफ्तर में आकर रूक गए। उसमें उन्होंने भंडारीजी को ही कारण माना। इसी कारण वे अपने मन में भंडारीजी के प्रति खिंचाव रखने लगे। समय-समय पर वे नरेश के सम्मुख भंडारीजी के विचारों और धारणाओं का उपहास भी करने लगे। भंडारीजी कच्ची गोलियां खेले हुए नहीं थे। वे भी उपहास का उत्तर बराबर के उपहास में देते। कभी तत्काल, तो कभी अवसर आने पर।

एक बार नरेश तख्तसिंहजी, मेहताजी और भंडारीजी तीनों ही खड़े बातें कर रहे थे। धार्मिक प्रसंग छिड़ जाने पर मेहताजी ने नरेश से कहा— "भंडारीजी के धर्म शास्त्र गप्पों के अच्छे उदाहरण हैं। उनमें लट आदि छोटे जीवों को भी कोसों लंबा बतलाया है।" नरेश ने पूछा तो भंडारीजी ने कहा— "चूहा और हाथी दोनों ही पांच इंद्रिय वाले प्राणी हैं। परंतु उनके शारीरिक आकार में बहुत बड़ा अंतर है। इसी प्रकार लट दो इंद्रिय वाला जीव है। वह आकार में छोटी होती है। पर दो इंद्रियां वाले तज्जातीय अन्य कई जीवों का आकार बहुत बड़ा भी होता है। शास्त्रों में बड़े आकार की बात लट के लिए नहीं, किंतु दो इंद्रिय वाले जीवों के लिए कही है। दूसरी बात यह भी है कि आकार और शक्ति का पहले की अपेक्षा ह्रास हुआ है। हम अपना ही उदाहरण ले सकते हैं। हमारे शस्त्रागार में अनेक तलवार और भाले ऐसे हैं जिन्हें आज कोई एक हाथ से नहीं उठा सकता, परंतु हमारे पूर्वज उनका प्रयोग करते थे।" नरेश ने उनकी बात को स्वीकार करते हुए कहा— "तुम ठीक कहते हो। हमारे पूर्वज हमारे से अधिक तगड़े और शक्तिशाली होते थे। मनुष्यों के आकार और शक्ति में जब अंतर आया है तो वैसा ही अंतर अन्य जीवों में आया हो तो क्या आश्चर्य है? यों भी मछली की एक जाति अंगुली से भी छोटी होती है तो दूसरी हाथी से भी बड़ी। ऐसा कहना कोई असंभव बात नहीं है।"

नरेश की स्वीकृति के पश्चात् वह बात तो वहीं समाप्त हो गई। परंतु भंडारीजी के मन में मेहताजी का व्यवहार चुभ गया। वे उसका बदला लेने का अवसर देखने लगे। कई दिनों पश्चात् उन्हें वैसा अवसर मिल गया। एक दिन नरेश तथा मेहताजी खड़े थे और भंडारीजी घोड़े पर चढ़े आ रहे थे। नरेश दूर थे, परंतु सामने दिखाई दे रहे थे, अतः भंडारीजी घोड़े से उतर गए। उन्होंने घोड़े की लगाम 'चरवादार' को थमा दी और स्वयं पैदल चलने लगे। पास में ही कुछ गायें खड़ी थीं। भंडारीजी उधर गए और प्रत्येक गाय की पूंछ हाथ में उठा-उठाकर कुछ देखने लगे। फिर वे नरेश के पास चले गए। मेहताजी ने उपहास करते हुए पूछा— "क्यों भंडारी साहब! कोई गाय पसंद आई?" नरेश ने भी हंसते हुए कहा— "गाय पसंद करने का यह अच्छा अवसर निकाला तूने।"

भंडारीजी ने झुककर नमस्कार करते हुए निवेदन किया— "नहीं अन्नदाता! गाय पसंद करने की कोई बात नहीं थी। मेहताजी के शास्त्रों में लिखा है कि गाय की पूंछ में तैंतीस करोड़ देवता निवास करते हैं। गायों को देखकर मुझे यह बात याद आ गई, अतः उनकी पूंछों को टटोल कर देख रहा था। परंतु वहां देवता तो एक भी नहीं मिला चींचड़ आदि क्षुद्र जंतु अवश्य थे। भंडारीजी की बात पर नरेश जोर से हंसे तथा मेहताजी की ओर देखने लगे कि देखें ये क्या उत्तर देते हैं? परंतु मेहताजी के पास कोई उत्तर नहीं था। मन ही मन वे समझ गए कि उस दिन की बात का उत्तर देकर आज बदला चुकाया गया है।

*बहादुरमलजी भण्डारी को जोधपुर नरेश द्वारा दिए गए विशेष सम्मान व साथ ही उन पर आए महाराज कुमार के रोष* के बारे में पढ़ेंगे और प्रेरणा पाएंगे... हमारी अगली पोस्ट में क्रमशः...

प्रस्तुति --🌻 *संघ संवाद* 🌻
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👉 उदासर - *'शासन श्री' साध्वी श्री विजयश्री जी का देवलोकगमन*

प्रस्तुति - 🌻 *संघ संवाद* 🌻

*उदासर में* विराजित *'शासन श्री' साध्वी श्री विजयश्री जी* का देवलोक गमन आज (दि. 12/06/2018) प्रातः लगभग 08:15 पर हो गया है।
*बेंकुठि यात्रा शाम 05:00 बजे* तेरापंथ सभा भवन से निकलेगी।
प्रेषक: 🙏🏻 *संघ संवाद* 🙏🏻

👉 प्रेक्षा ध्यान के रहस्य - आचार्य महाप्रज्ञ

प्रकाशक - प्रेक्षा फाउंडेसन

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🌻 *संघ संवाद* 🌻

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