04.11.2011 ►Kelwa ►Jainism Shows Path Of Non-Violence► Swami Somyanath

Posted: 04.11.2011
Updated on: 21.07.2015

Short News in English

 

 

Location:

Kelwa

Headline:

Jainism Shows Path Of Non-Violence► Swami Somyanath

News:

Two Saint from Karnataka met with Acharya Mahashraman and jointly addressed public. Acharya Mahashraman told that we should try to develop Sadhana of Sanyam to get Moksha. Swami Somyanath told that India is country of many religions. Jainism is very important. It shows way of Non-violence. Mantri Muni Sumermal told that South India is known for devotion. Shivrudra Mahaswami to Amrit Mahotsva is not only for Jains but for all of us. He requested Acharya Mahashraman to give his acceptance to come South India. Function compeered by Muni Mohjeet Kumar.


 

News in Hindi

तेरापंथ समवसरण में चातुर्मास के दौरान गुरुवार को दैनिक प्रवचन में कहा, कर्नाटक के दो संतों ने भी दिया प्रेरणा पाथेय

धर्म के स्पर्श व आराधना से देवगति संभव: महाश्रमण

तेरापंथ समवसरण में चातुर्मास के दौरान गुरुवार को दैनिक प्रवचन में कहा, कर्नाटक के दो संतों ने भी दिया प्रेरणा पाथेय

केलवा ३ नवम्बर २०११ जैन तेरापंथ न्यूज ब्योरो

तेरापंथ धर्म संघ के 11वें अधिशास्ता आचार्य महाश्रमण ने कहा कि जो व्यक्ति धर्म का स्पर्श और उसकी आराधना करता है। वह मृत्यु के बाद देवता बनते हैं और मोक्ष के पथ पर अग्रसर होकर देवगति में जाते हैं। संयम की साधना में रहने से व्यक्ति को इस तरह की गति मिलना संभव है।

आचार्यश्री ने यह विचार यहां तेरापंथ समवसरण में चल रहे चातुर्मास के दौरान गुरुवार को देशभर के विभिन्न प्रांतों से समागत श्रावक-श्राविकाओं को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। उन्होंने संबोधि के छठे अध्याय में उल्लेखित देवगति के कारण को परिभाषित करते हुए कहा कि व्यक्ति को कभी भी देवता बनने की आकांक्षा नहीं रखनी चाहिए। कर्म में निर्जरा होगी तो मोक्ष की प्राप्ति स्वत: ही संभव हो सकेगी। निर्जरा के साथ पुण्य होना भी आवश्यक है। जिस तरह से गेहूं के साथ भूसी होती है वैसे ही निर्जरा के साथ पुण्य है। हमें संयम की साधना का विकास करने की आवश्यकता है।

भक्ति का क्षेत्र है दक्षिण के राज्य

मंत्री मुनि सुमेरमल ने कहा कि आचार्यश्री की पूर्वोत्तर राज्यों की यात्रा की तैयारियां चल रही है और दक्षिण के लोग अपनी अर्ज लेकर पहुंचे है। देश के पूर्व को ज्ञान, दक्षिण को भक्ति, उत्तर को तर्क और पश्चिम को क्रिया का क्षेत्र माना गया है। दक्षिण के राज्य भक्ति प्रधान इलाके है। यहां की सामान्य जनता में भी भक्ति के दर्शन होते है। संतों को देखकर गांव-ढाणी में रहने वाला व्यक्ति भी दंडवत करता है।

शांति और भाईचारा बना रहे: स्वामी सौम्यनाथ

कर्नाटक के आदि चुनचुन गिरि के स्वामी सौम्यनाथ ने कहा कि भारत में अनेक धर्म हैं। इन सब धर्मों में जैन धर्म बहुत महत्वपूर्ण है। यह देशवासियों को अहिंसा के पथ पर ले जाने का उपयोगी उपक्रम कर रहा है। उन्होंने कहा कि जैन धर्म देश ही नहीं वरन विदेश में भी अहिंसा, व्यसन मुक्त और अणुव्रत के माध्यम से जीने का संदेश प्रसारित कर रहा है। इस तरह का प्रयास अनवरत रूप से जारी रहना चाहिए, तभी आमजन के जीवन में व्यापक बदलाव आने की संभावना बन सकेगी।

श्रद्धा की रोशनी का प्रकाश हो: महास्वामी

कर्नाटक के बेली मठ के शिवरुद्र महास्वामी ने कहा कि आचार्य महाश्रमण का अमृत महोत्सव केवल जैन धर्म का नहीं बल्कि हम सब के लिए है। दक्षिण की जनता आचार्यश्री के आगमन की प्रतीक्षा कर रहा है। इक्कीसवीं सदी में आपके चरण इस धरा पर पड़ जाए तो यहां की धरती पवित्र हो जाएगी। आप दक्षिण की यात्रा की स्वीकृति दें ताकि वहां के लोगों को धर्म, संयम और आराधना की खुशबू और प्रकाश से भक्तिमय बनाया जा सके। उनमें अहिंसा की भावना जागृत हो। संयोजन मुनि मोहजीत कुमार ने किया।


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