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https://youtu.be/jrotVzF79jw
राजरहट, कोलकत्ता से.....
दीपावली के पावन अवसर पर
*पुज्यवर द्वारा वृहद मंगल पाठ* का वीडियो और यूट्यूब लिंक
दिनांक - 19-10-2017
प्रस्तुति - अमृतवाणी
सम्प्रेषण - तेरापंथ *संघ संवाद*
राजरहट, कोलकत्ता से.....
दीपावली के पावन अवसर पर
*पुज्यवर द्वारा वृहद मंगल पाठ*
📍 मंगल पाठ श्रवण हेतु उमड़ा जान सैलाब
📍 सांय 7:21 पर पुज्यवर ने शुरू किया मंगल पाठ
📍वृहद मंगल पाठ अवसर के कुछ विशेष दृश्य
दिनांक - 19-10-2017
प्रस्तुति - तेरापंथ *संघ संवाद*
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👉 केसिंगा - आतिशबाजी को कहें ना एवं इको फ्रेंडली दीपावली पर संयुक्त कार्यक्रम
👉 राउरकेला - आध्यात्मिक जप अनुष्ठान का कार्यक्रम आयोजित
👉 दक्षिण हावड़ा - आध्यात्मिक जप अनुष्ठान का कार्यक्रम आयोजित
👉 अहमदाबाद - धनतेरस पर जैन संस्कार विधि से सामूहिक चौपड़ा पूजन
प्रस्तुति: 🌻तेरापंथ *संघ संवाद*🌻
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News in Hindi
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त्याग, बलिदान, सेवा और समर्पण भाव के उत्तम उदाहरण तेरापंथ धर्मसंघ के श्रावकों का जीवनवृत्त शासन गौरव मुनि श्री बुद्धमलजी की कृति।
📙 *'नींव के पत्थर'* 📙
📝 *श्रंखला -- 3* 📝
*चतरोजी पोरवाल*
*स्वामीजी राजनगर में*
गतांक से आगे...
स्वामीजी के कथन से श्रावकों को जहां आश्वासन मिला वहां स्वामीजी के मन में एक तुमुल संघर्ष छिड़ गया। उन्हें लगा कि श्रावकों की शंकाएं निराधार नहीं है। उसी रात्रि में अचानक वे ज्वरग्रस्त हो गए। शीतदाह से उनका शरीर थर-थर कांपने लगा। ज्वर ने शरीर के साथ उनके मन को झकझोर डाला। वे सोचने लगे— "मैंने जिनवाणी के पीछे घर छोड़ा है, किसी व्यक्ति के पीछे नहीं। पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर आज मैंने जिनवाणी के प्रतिकूल कार्य किया। श्रावक सत्य कह रहे हैं, उन्हें मैंने तर्कबल से निरस्त किया और साधु-समुदाय के अयुक्त कार्यों का समर्थन किया। यदि इसी समय मेरा आयुष्य पूर्ण हो जाए तो अवश्य ही मुझे दुर्गति में जाना पड़े। ऐसे अवसर पर न मतपक्ष कोई त्राण कर सकता है और न गुरु। मुझे आत्महित के लिए ही गंभीरता पूर्वक सोचना चाहिए।" उन्होंने संकल्प किया— "यदि मैं इस ज्वर से मुक्त हो गया तो सत्य मार्ग को स्वीकार कर आत्म-कल्याण करूंगा।" संयोगवश उसी समय से उनका ज्वर शांत होना आरंभ हो गया। थोड़े समय के पश्चात् तो वे पूर्ण रूप से ज्वर मुक्त हो गए। प्रभात होते ही उन्होंने श्रावकों को अपने निर्णय से अवगत कर दिया। चतरोजी आदि सभी श्रावक उक्त निर्णय को सुनकर गदगद हो गए।
स्वामीजी ने सत्य की खोज के लिए आगमों का गंभीरतापूर्वक अध्ययन प्रारंभ किया। अनेक भाई भी आगम श्रवण में भाग लेने लगे। एक बार परथोजी खाटेड़ तथा लालजी पोरवाल ने कहा— "स्वामीजी पूर्ण सावधानी के साथ आगम मंथन कर के आप को रहस्यों की खोज करनी है।" स्वामीजी ने वैसा ही किया। उस चातुर्मास में उन्होंने तटस्थ बुद्धि से दो बार आगमों का पारायण किया। चातुर्मास की समाप्ति के आसपास अपने अध्ययन के निष्कर्ष की घोषणा करते हुए उन्होंने श्रावकों से कहा— "श्रावकों! तुम लोग सही हो। वास्तव में ही साधु वर्ग शास्त्र सम्मत मार्ग से भटक गया है। परंतु इसके लिए धैर्य खोने की आवश्यकता नहीं। मैं गुरु के पास जाकर निवेदन करूंगा। अवश्य ही सम्यक् परिवर्तन के लिए कोई न कोई उपाय खोज लिया जाएगा।"
श्रावक वर्ग स्वामीजी के कथन से अत्यंत संतुष्ट हुआ। चतरोजी आदि ने कहा— "हमें आपसे जैसा भरोसा था आपने वैसा ही कार्य कर दिखाया। अपने अग्रिम चरण में भी आप पूर्ण सफल हों, हमारी यही कामना है।"
स्वामीजी ने अपने साथ के साधुओं को भी सैद्धांतिक निष्कर्षों से अवगत किया। उन सबके हृदय में भी विचार सुचारु रुप से जम गए। इस प्रकार स्वामीजी का वह चातुर्मास अत्यंत गुणकारी सिद्ध हुआ। चातुर्मास की समाप्ति पर उन्होंने राजनगर से विहार किया तब तक आगमन की अपेक्षा वे कहीं शतगुण अधिक श्रद्धा के पात्र बन गए थे।
*स्वामीजी की धर्म-क्रांति* के बारे में पढेंगे... हमारी अगली पोस्ट में... क्रमशः...
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प्रस्तुति --🌻तेरापंथ *संघ संवाद*🌻
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जैनधर्म की श्वेतांबर और दिगंबर परंपरा के आचार्यों का जीवन वृत्त शासन श्री साध्वी श्री संघमित्रा जी की कृति।
📙 *जैन धर्म के प्रभावक आचार्य'* 📙
📝 *श्रंखला -- 179* 📝
*प्रबुद्धचेता आचार्य पुष्पदन्त एवं भूतबलि*
*षट्खंडागम की प्रामाणिकता—* छह खंडों में परिपूर्ण यह षट्खंडागम कषाय पाहुड़ की भांति सैद्धांतिक ग्रंथ है।
महाकर्म प्रकृति प्राभृत का उपसंहार षट्खंडागम कृति में होने के कारण दिगंबर परंपरा में इसे आगम ग्रंथ की भांति प्रामाणिक माना गया है।
जिनपालित, आचार्य पुष्पदंत और भूतबलि के मध्य ग्रंथ निर्माण में संयोजक सिद्ध हुए। संभवतः आचार्य भूतबलि के पास रहकर ग्रंथ लेखन का कार्य भी जिनपालित ने किया हो।
षट्खंडागम ग्रंथ की रचना ज्येष्ठ शुक्ला पंचमी के दिन पूर्ण हुई। आचार्य भूतबलि ने संघ सहित इस ग्रंथ की भक्ति पूर्वक और विधि से पूजा की। तब से यह पंचमी श्रुतपंचमी के नाम से प्रसिद्ध हुई। यह ग्रंथ संपन्न हुआ, इस समय तक आचार्य पुष्पदंत विद्यमान थे। भूतबलि ने इस ग्रंथ को संपन्न कर आचार्य जिनपालित के साथ प्रेषित किया। विविध सामग्री से परिपूर्ण इस ग्रंथ को देखकर आचार्य पुष्पदंत को अत्यंत प्रसन्नता हुई। उन्होंने भी भक्ति भाव से श्रुतपंचमी के दिन ग्रंथ की पूजा की।
*समय-संकेत*
पुष्पदंत और भूतबलि दोनों का अधिकांश जीवन साथ-साथ व्यतीत हुआ। दोनों ने एक साथ दीक्षा ली। दोनों ने एक साथ आचार्य धरसेन के पास अध्ययन किया। षट्खंडागम ग्रंथ की रचना दोनों ने भिन्न-भिन्न स्थानों पर की। जिस समय भूतबलि ने ग्रंथ रचना प्रारंभ की, उस समय पुष्पदंत के जीवन का संध्याकाल था। संयोग से षट्खंडागम ग्रंथ की संपन्नता तक आचार्य पुष्पदंत विद्यमान थे।
नंदी संघ की पट्टावली में आचार्य अर्हद्बलि, आचार्य माघनंदी, आचार्य धरसेन के बाद पुष्पदंत और भूतबलि का क्रमशः उल्लेख है। पांचों आचार्यों के इस क्रम में आचार्य भूतबलि से पुष्पदंत आचार्य ज्येष्ठ थे।
नंदी संघ की पट्टावली में इन आचार्यों के समय की सूचना है। आचार्य धरसेन का समय वीर निर्वाण 614 से 633 तक है। पुष्पदंत और भूतबलि का समय इसके बाद प्रारंभ होता है। आचार्य पुष्पदंत का काल 30 वर्ष का और भूत बली का काल 20 वर्ष का माना गया है। इस आधार पर आचार्य पुष्पदंत का समय वीर निर्वाण 633 से 663 (विक्रम संवत 163 से 193) तक और आचार्य भूतबलि का काल वीर निर्वाण 663 से 683 (विक्रम संवत 193 से 213) तक सिद्ध होता है। आचार्य पुष्पदंत और भूतबलि दोनों का सम्मिलित समय वीर निर्वाण 633 से 683 तक का है। यह कालगणना प्राकृत नंदी पट्टावली के आधार पर है।
इंद्रनंदी श्रुतावतार और हरिवंश पुराण में आचारांगधर लोहाचार्य की जो पट्ट परंपरा है इस आधार पर अर्हद्बलि का समय वीर निर्वाण की 8 वीं सदी संभव है। अर्हद्बलि से उत्तरवर्ती धरसेनाचार्य हैं। धरसेनाचार्य के बाद आचार्य पुष्पदंत और भूतबलि हुए हैं। अतः पुष्पदंत और भूतबलि का समय वीर निर्वाण की 8 वीं शताब्दी से पूर्व संभव नहीं है।
*रत्नत्रयी-आराधक आचार्य रेवतीनक्षत्र, आचार्य ब्रह्मद्वीपकसिंह के प्रभावक चरित्र* के बारे में पढेंगे और प्रेरणा पाएंगे... हमारी अगली पोस्ट में... क्रमशः...
प्रस्तुति --🌻तेरापंथ *संघ संवाद*🌻
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