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🧘♂ *प्रेक्षा ध्यान के रहस्य* 🧘♂
🙏 *आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी* द्वारा प्रदत मौलिक प्रवचन
👉 *प्रेक्षा वाणी: श्रंखला ३०* - *मानसिक स्वास्थ्य और प्रेक्षाध्यान ८*
एक *प्रेक्षाध्यान शिविर में भाग लेकर देखें*
आपका *जीवन बदल जायेगा* जीवन का *दृष्टिकोण बदल जायेगा*
प्रकाशक
*Preksha Foundation*
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🌻 *संघ संवाद* 🌻
🌏 *अणुव्रत महासमिति* द्वारा निर्देशित ☝
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🚫 *"नशामुक्ति प्रकल्प"*
एवं
🇮🇳 *झंडेटोलन* व *"लोकतंत्र शुद्धि"*
कार्यक्रमों का आयोजन..
👉 दिल्ली - झंडोत्तोलन एवं लोकतंत्र शुद्धि कार्यक्रम का आयोजन
👉 जयपुर - झंडोत्तोलन एवं लोकतंत्र शुद्धि कार्यक्रम का आयोजन
👉 मुम्बई - झंडोत्तोलन एवं लोकतंत्र शुद्धि कार्यक्रम का आयोजन
👉 खारुपेटिया(असम) - झंडोत्तोलन कार्यक्रम का आयोजन
👉 अहमदाबाद - झंडोत्तोलन एवं लोकतंत्र शुद्धि कार्यक्रम का आयोजन
👉 सिलीगुड़ी - झंडोत्तोलन एवं लोकतंत्र शुद्धि कार्यक्रम का आयोजन
👉 बेंगलुरु - झंडोत्तोलन एवं लोकतंत्र शुद्धि कार्यक्रम का आयोजन
👉 जयपुर - नशामुक्ति पर कार्यक्रम का आयोजन
👉 मुम्बई - नशामुक्ति का प्रचार प्रसार
👉 अहमदाबाद- नशामुक्ति प्रकल्प के तहत कार्यक्रम का आयोजन
👉 बारडोली - नशा मुक्ति अभियान
👉 सादुलपुर राजगढ़ - नशामुक्ति कार्यक्रम का आयोजन
👉 भीलवाड़ा - नशामुक्ति कार्यक्रम का आयोजन
👉 अहमदाबाद - नशामुक्ति कार्यक्रम का आयोजन
📡 *अणुव्रत सोशल मीडिया* 📡
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👉 सिरियारि: “गणतंत्र दिवस” और “मंगल भावना” समारोह का आयोजन
👉 जींद - जैन संस्कार विधि से सामुहिक जन्मोत्सव
👉 दिल्ली - जैन संस्कार विधि से नामकरण
👉 बारडोली - जैन संस्कार विधि से सामूहिक जन्मोत्सव कार्यक्रम
👉 सिलीगुड़ी - जैन संस्कार विधि के बढते चरण
👉 मुंबई - "Mega Month of Wellness" के लोगो व कलेंडर का विमोचन
👉 कोलकाता - "वास्तविक खुशियाँ अपनाये, जीवन बगिया सरसाये" कार्यशाला एवं "भजनमंड़ली प्रतियोगिता" का आयोजन
👉 बेंगलुरु - भजन मंडली प्रतियोगिता का आयोजन
👉 बेहाला, कोलकाता - "मेगा ब्लड डोनेशन कैम्प" का आयोजन
👉 पाली - कन्या सुरक्षा स्तंभ का उद्घाटन समारोह
👉 बेंगलुरु - शिशु बोध संस्कार पुरस्कार वितरण समोरह का आयोजन
👉 बारडोली - दिव्यांग विधार्थी विद्यालय में सेवा कार्यक्रम
👉 भिलवाड़ा - "संगीतमय सार्थक भक्ति जगाएँ आत्मशक्ति" कार्यशाला का आयोजन
👉 गुलाब बाग - कनेक्शन विद डिवोशन भजन मंडली गीत गायन प्रतियोगिता का आयोजन
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👉 दिल्ली: *‘अमृतवाणी’* संस्था की वर्ष 2019-20 कार्यकाल की *प्रथम ट्रस्ट बोर्ड मीटिंग* एवं *“संपर्क संगोष्ठी”* का आयोजन
प्रस्तुति: 🌻 *संघ संवाद* 🌻
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⛩ *तिरुचिरापल्ली* (T.N.): *पूज्यप्रवर के दर्शनार्थ प्रबुद्ध जन..*
💠 *राज्य के पर्यटन मंत्री श्री वेल्लमण्डी नटराजन*
💠 *पिछड़ा वर्ग मंत्री श्रीमती वलरमथि*
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जैनधर्म की श्वेतांबर और दिगंबर परंपरा के आचार्यों का जीवन वृत्त शासन श्री साध्वी श्री संघमित्रा जी की कृति।
📙 *जैन धर्म के प्रभावक आचार्य* 📙
📝 *श्रंखला -- 526* 📝
*शान्तिस्रोत आचार्य शान्तिसागर*
*जीवन-वृत्त*
गतांक से आगे...
शांतिसागरजी शरीर से स्वस्थ एवं हष्ट-पुष्ट थे। व्यायाम में थोड़ी सी शक्ति लगाकर चार-पांच व्यक्तियों को पछाड़ देते थे। बलवान बैलों द्वारा जो पानी खींचा जाता है, उसे वे अकेले ही आसानी से खींच लेते थे। वे दूर-दूर तक छलांग भरने में दक्ष थे।
बाल्यकाल से ही उनके जीवन में साध्वोचित गुणों का विकास होने लगा। वे मितभाषी थे। उनमें वृद्धजनों जैसी गंभीरता और विवेक था।
परिवार का वातावरण धार्मिक होने के कारण शांतिसागरजी में धर्म के प्रति गहरी निष्ठा थी। उनका मन मुनियों की भक्ति में विशेष प्रसन्न रहता था। कभी-कभी मुनियों को अपने कंधे पर बैठाकर वेद गंगा और दूध गंगा के संगम स्थल के पार ले जाते थे। उनके घर व्यवहार में विनय और नम्रता के गुण अभिव्यक्त होते थे।
उनमें निर्ग्रंथ बनने की भावना 18 वर्ष की उम्र में ही जागृत हो गई थी, पर पिता के आग्रह पर वे गृहस्थ जीवन में रहे। पिता का पुत्र पर अत्यंत अनुराग था। सातगौंडा (शांतिसागरजी) घर में रहकर भी कमल तुल्य निर्लेप थे। उनका लौकिक कार्यों में रस नहीं था। बहन कृष्णा और भाई कुंभगौंडा की शादी के उत्सव में भी सम्मिलित नहीं हुए। उनके साथी जहां खेलकूद, आमोद-प्रमोद के कार्यों में आनंद लेते थे, वहां वे धार्मिक उत्सवों में पहुंचते एवं धार्मिक प्रवृत्तियों को संपादित करने में प्रवृत्त होते थे।
उनकी कपड़े की दुकान थी। जिसे उन का छोटा भाई संभालता था। आवश्यकतावश दुकान पर बैठते, पर इस कार्य में उनकी रुचि नहीं थी। भाई की अनुपस्थिति में माल बेचने का प्रसंग आता उस समय वे अपने ग्राहकों से कहते "कपड़ा माप कर ले लो और बही (खाता) में लिख दो।" दुनियादारी के प्रति यह निरपेक्ष भाव सहज विरक्ति का सूचक था।
शांतिसागरजी का विवाह नौ वर्ष की अवस्था में कर दिया गया। संयोग से विवाह के कुछ समय बाद ही पत्नी की मृत्यु हो गई। माता-पिता ने उनका पुनः विवाह करना चाहा, पर उन्होंने मना कर दिया। मुनिजनों के संपर्क से उनकी धार्मिक भावना उत्तरोत्तर विकास पाती रही। ब्रह्मचर्य का आजीवन व्रत स्वीकार कर भोजन में घृत आदि का परिहार कर उन्होंने गृहस्थ जीवन में तपस्वी जैसा जीवन प्रारंभ कर दिया।
उन्होंने माता-पिता के प्रति अपने दायित्व को अच्छी तरह से निभाया। उनकी समाधिपूर्ण मृत्यु में वे सहयोगी रहे, पर उनका देहावसान हो जाने पर शांतिसागरजी ने आंसू नहीं बहाए। उन्होंने आत्मा और देह के भेद को अच्छी तरह से समझ लिया और भेदज्ञान का यह बोध उनके आत्मगत हो गया था।
*शान्तिस्रोत आचार्य शान्तिसागर की दीक्षा व मुनि जीवन* के बारे में जानेंगे और प्रेरणा पाएंगे... हमारी अगली पोस्ट में... क्रमशः...
प्रस्तुति --🌻 *संघ संवाद* 🌻
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अध्यात्म के प्रकाश के संरक्षण एवं संवर्धन में योगभूत तेरापंथ धर्मसंघ के जागरूक श्रावकों का जीवनवृत्त शासन गौरव मुनि श्री बुद्धमलजी की कृति।
🛡 *'प्रकाश के प्रहरी'* 🛡
📜 *श्रंखला -- 180* 📜
*बालचंदजी कठोतिया*
*अग्नि-स्फुलिंग*
गतांक से आगे...
बालचंदजी जब 19 वर्ष के हुए तब बाबा बिंजराजजी गुजर गए। घर तथा व्यापार का सारा कार्यभार अकेले उन्हीं पर आ गया। उन्होंने उस अपरिपक्व अवस्था में भी बड़े साहस के साथ सारे कार्य को अपने हाथ में ले लिया। बिंजराजजी के समक्ष उनके परिवारगत जामाता जीवनमलजी बैंगानी सारे कार्य की देखरेख किया करते थे। बालक बालचंदजी के कार्य संभालते ही उन दोनों में परस्पर पट नहीं पाई। दोनों अपने-अपने प्रभाव को ऊपर रखना चाहते थे। एक व्यापार के जानकार थे तो दूसरे स्वामी। मतभेद की स्थिति में जीवनमलजी ने कार्य छोड़ने की धमकी दी तो बालचंदजी ने तत्काल उन्हें छुट्टी देकर सारा कार्यभार स्वयं संभाल लिया। एक नए व्यक्ति के लिए इतना साहस कर पाना कठिन ही हो पाता है, किंतु उन जैसे व्यक्ति के लिए वह कोई कठिन कार्य नहीं था।
उन्होंने व्यापार क्षेत्र में शीघ्र ही अपना सिक्का जमा लिया। व्यवस्थाओं में आवश्यकतानुसार परिवर्तन किया और धीरे-धीरे व्यापार को बहुत आगे बढ़ा ले गए। जूट की तीन प्रसों में लगभग 12 लाख मन पाट प्रतिवर्ष खरीदा जाता और फिर पक्की गांठें बांधकर बेचा जाता था। उस समय कलकत्ता में पक्की गांठें बांधने वाले मारवाड़ी समाज में केवल तीन फर्म ही थे। उनमें से एक इनका था। बंगाल और आसाम में उनके व्यापार की 35 शाखाएं थीं। यद्यपि वे अंग्रेजी पढ़े-लिखे नहीं थे, फिर भी अभ्यासवश अच्छी तरह बातचीत कर लेते थे। अंग्रेज व्यापारियों तथा अफसरों में उनका एक विशेष प्रभाव था। वे प्रायः उनके ऑफिस में कम ही जाया करते थे। जब कभी विशेष कार्यवश जाते तब साहब स्वयं खड़ा होकर उन्हें आदर दिया करता था।
कठोतिया परिवार को सम्पत्तिशाली बनाने का श्रेय मुख्यतः उन्हीं को है। उन्होंने अपने व्यापार की नींव प्रामाणिकता पर स्थापित की थी। जहां अन्य व्यापारी माल खरीदने तथा बेचने में काफी गोलमाल चलाया करते थे वहां वे उससे उतने ही अधिक दूर रहा करते थे। यही कारण था कि एक ही कोटि का माल होने पर भी उनके मार्के का माल अपेक्षाकृत ऊंचे मूल्य पर बिका करता था। न केवल भारत में, विलायत में भी वह ऊंचे मूल्य पर बिका करता था। यह क्रम बालचंदजी के बाद भी तब तक चलता रहा जब तक कि भारत विभाजन के पश्चात् संवत् 2008 में उस कार्य को स्वयं ही कठोतिया परिवार में बंद नहीं कर दिया।
*सुजानगढ़ के श्रावक बालचंदजी कठोतिया की प्रामाणिक नीति के कुछ प्रसंगों* के बारे में जानेंगे और प्रेरणा पाएंगे... हमारी अगली पोस्ट में क्रमशः...
प्रस्तुति --🌻 *संघ संवाद* 🌻
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🙏 *पूज्यप्रवर अपनी धवल सेना के साथ प्रातःविहार करके "ओलप्पालयम-पचहपालयम" पधारेंगे..*
🛣 *आज प्रातःकाल का विहार लगभग 12 कि.मी. का..*
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🙏 *साध्वीप्रमुखा श्री जी विहार करते हुए..*
👉 *आज के विहार के कुछ मनोरम दृश्य..*
दिनांक: 29/01/2019
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