02.03.2017 ►STGJG Udaipur ►News

Posted: 02.03.2017

News in Hindi

अनादिनिधन मंत्र -* यह मंत्र शाश्वत है, न इसका आदि है और न ही अंत है ।
*अपराजित मंत्र -* यह मंत्र किसी से पराजित नहीं हो सकता है ।
*महामंत्र -* सभी मंत्रों में महान् अर्थात् श्रेष्ठ है ।
*मूलमंत्र -* सभी मंत्रों का मूल मंत्र अर्थात् जड़ है, जड़ के बिना वृक्ष नहीं रहता है, इसी प्रकार इस मंत्र के अभाव में कोई भी मंत्र टिक नहीं सकता है ।
*मृत्युंजयी मंत्र -* इस मंत्र से मृत्यु को जीत सकते हैं अर्थात् इस मंत्र के ध्यान से मोक्ष को भी प्राप्त कर सकते हैं ।
*सर्वसिद्धिदायक मंत्र -* इस मंत्र के जपने से सभी ऋद्धि सिद्धि प्राप्त हो जाती है ।
*तरणतारण मंत्र -* इस मंत्र से स्वयं भी तर जाते हैं और दूसरे भी तर जाते हैं ।
*आदि मंत्र -* सर्व मंत्रों का आदि अर्थात् प्रारम्भ का मंत्र है ।
*पंच नमस्कार मंत्र -* इसमें पाँचों परमेष्ठियों को नमस्कार किया जाता है ।
*मंगल मंत्र -* यह मंत्र सभी मंगलों में प्रथम मंगल है ।
*केवलज्ञान मंत्र -* इस मंत्र के माध्यम से केवलज्ञान भी प्राप्त कर सकते हैं ।

🌇 🚩 *प्रश्न: णमोकार मंत्र कहाँ कहाँ पढ़ना चाहिए?*

उत्तर - दुःख में, सुख में, डर के स्थान, मार्ग में, भयानक स्थान में, युद्ध के मैदान में एवं कदम कदम पर णमोकार मंत्र का जाप करना चाहिए । यथा -

*दुःखे - सुखे भयस्थाने, पथि दुर्गे - रणेSपि वा ।*
*श्री पंचगुरु मंत्रस्य, पाठ: कार्य: पदे पदे ॥*

🌇 🚩 *प्रश्न: क्या अपवित्र स्थान में णमोकार मंत्र का जाप कर सकते हैं?*
उत्तर - यह मंत्र हमेशा सभी जगह स्मरण कर सकते हैं, पवित्र व अपवित्र स्थान में भी, किंतु जोर से उच्चारण पवित्र स्थानों में ही करना चाहिए । अपवित्र स्थानों में मात्र मन से ही पढ़ना चाहिए ।

🌇 🚩 *प्रश्न: णमोकार मंत्र ९ या १०८ बार क्यों जपते हैं?*

उत्तर - ९ का अंक शाश्वत है उसमें कितनी भी संख्या का गुणा करें और गुणनफल को आपस में जोड़ने पर ९ ही रहता है ।
जैसे ९*३ =२७, २ + ७ = ९

कर्मों का आस्रव १०८ द्वारों से होता है, उसको रोकने हेतु १०८ बार णमोकार मंत्र जपते हैं । प्रायश्चित में २७ या १०८, श्वासोच्छवास के विकल्प में ९ या २७ बार णमोकार मंत्र पढ़ सकते हैं ।

🌇 🚩 *प्रश्न: आचार्यों ने उच्चारण के आधार पर मंत्र जाप कितने प्रकार से कहा है?*

उत्तर - *वैखरी -* जोर जोर से बोलकर मंत्र का जाप करना चाहिए जिसे दूसरे लोग भी सुन सकें ।
*मध्यमा -* इसमें होंठ नहीं हिलते किंतु अंदर जीभ हिलती रहती है ।
*पश्यन्ति -* इसमें न होंठ हिलते हैं और न जीभ हिलती है इसमें मात्र मन में ही चिंतन करते हैं ।
*सूक्ष्म -* मन में जो णमोकार मंत्र का चिंतन था वह भी छोड़ देना सूक्ष्म जाप है । जहाँ उपास्य उपासक का भेद समाप्त हो जाता है । अर्थात् जहाँ मंत्र का अवलंबन छूट जाये वो ही सूक्ष्म जाप है ।

🌇 🚩 *प्रश्न: इस मंत्र का क्या प्रभाव है?*
उत्तर - यह पंच नमस्कार मंत्र सभी पापों का नाश करने वाला है । तथा सभी मंगलों में प्रथम मंगल है । यथा -
*एसो पंच णमोयारो सव्वपावप्पणासणो ।*
*मंगलाणं च सव्वेसिं पढमं होई मंगलं । ।*

मंगल शब्द का अर्थ दो प्रकार से किया जाता है ।
मंङ्ग = सुख । ल = ददाति, जो सुख को देता है, उसे मंगल कहते हैं ।
मंगल - मम् = पापं । गल = गालयतीति = जो पापों को गलाता है, नाश करता है उसे मंगल कहते हैं ।

मंत्र के प्रभाव से -
🕌पद्मरुचि सेठ ने बैल को मंत्र सुनाया तो वह सुग्रीव हुआ ।
🕌रामचंद्र जी ने जटायु पक्षी को सुनाया तो वह स्वर्ग में देव हुआ ।
🕌जीवंधर कुमार ने कुत्ते को सुनाया तो वह यक्षेन्द्र हुआ ।
🕌अंजन चोर ने मंत्र पर श्रद्धा रखकर आकाश गामिनी विद्या को प्राप्त किया ।

गुरु पुष्कर तीर्थ पावन धाम (सेमटाल) उदयपुर में पधारें प्रवर्तक श्री रूपमुनि जी म

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