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Posted: 04.06.2017
Updated on: 05.06.2017

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मीरा भायंदर: पार्श्व भैरव भक्ति भजन 25 जुन को
Jain Star News Network | Jun 03, 2017
मीरा भायंदर | श्री नाकोड़ा पार्श्व भैरव सेवा संस्थान की ओर से रविवार 25 जून को पार्श्व भैरव भक्ति कार्यक्रम का आयोजन किया गया है । नाकोड़ा पार्श्व भैरव के नाम महाभक्ति कार्यक्रम रविवार,25 जून को सुबह साढ़े नौ बजे से साढ़े बारह बजे ड़ी मार्ट के बाजु 150 फ़ीट रोड स्थित अशोका हाँल में आयोजित होगा। श्री नाकोड़ा पार्श्व भैरव सेवा संस्थान के संस्थापक रणवीर गेमावत से प्राप्त जानकारी के अनुसार यह भक्ति आयोजन 30 जून को मुंबई से प्रस्थान हो रहे श्री नाकोड़ा तीर्थ यात्रा निमित्त है। जिसमे क़रीब 625 तीर्थ यात्री नाकोड़ाजी तीर्थ सहित पंचतीर्थी यात्रा पहली बार कर रहे है ।25 जून को भव्य पार्श्व भैरव भक्ति के साथ-साथ सभी तीर्थ यात्रियों को टिकीट वितरण व आवश्यक हिदायते दी जाएगी। इस तीर्थ यात्रा प्रवास,भक्ति के संपूर्ण लाभार्थी गोडवाड़ के रानी गाँव निवासी संजयकुमार हस्तीमलजी मुठलिया (मुंबई) परिवार है।

28 जून से देश भर में आचार्यश्री का स्वर्ण दीक्षा महामहोत्सव
दिगम्बर सरोवर के राजहंस हैं आचार्य श्रेष्ठ विद्यासागर जी महाराज
By-डॉ सुनील जैन 'संचय', ललितपुर
हमारी यह भूमि पवित्र और पावन है। भारत एक ऐसा देश है जहाँ हमेशा एक से एक बढ़कर तपोनिष्ठ साधु- संत- ऋषि एवं महापुरुष हुए हैं जिन्होने भारतीय सांस्कृतिक एवं आचरणात्मक नैतिक मूल्यों की अजस्र धारा निरंतर प्रवाहित की है, जिनमें अवगाहन कर अनेकों जीवों ने अपने को सफल बनाया है। ऐसे ही संत मुनियों में एक हैं आचार्य श्रेष्ठ विद्यासागर जी महाराज। आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज दिगम्बर जैन परंपरा के ऐसे महान संत हैं जो सही मायने में साधना, ज्ञान, ध्यान व तपस्यारत होकर आत्मकल्याण के मार्ग पर अग्रसर हैं। वे पंचमकाल में चतुर्थकाल सम संत हैं। महाप्रज्ञ आचार्यश्री की तपस्तेज सम्पन्न एवं प्रसन्न मुख मुद्रा प्रायः सभी का मन मोह लेती है। आचार्यश्री के कंठ में भी अपने गुरु के समान ही सरस्वती का निवास है।
आचार्यश्री की पावन वाणी सत्यं, शिवं, सुन्दरं की विराट अभिव्यक्ति तथा मुक्तिद्वार खोलने में सर्वथा सक्षम है। उन्होंने अपनी अनवरत साधना से जीवन की कलात्मकता को भारतीय संस्कृति के अनुरूप अभिव्यक्त किया है। परंपरागत धार्मिक व सांस्कृतिक धारणाओं में व्याप्त कुरीतियों एवं विघटन को समझकर वे उन्हें हटा देने को व्याकुल हैं। इसीलिये धर्म की वैज्ञानिक, सहज,सरल व्याख्या आचार्यश्री जी ने उपलब्ध कराई है।
जैन धर्म के आचार्य श्रेष्ठ व कुंडलपुर के छोटे बाबा आचार्य श्री 108विद्यासागर जी महाराज की 50वीं मुनिदीक्षा महोत्सव को संयम स्वर्ण महोत्सव वर्ष के रूप में सम्पूर्ण भारत देश में मनाया जा रहा है यह एक ऐतिहासिक वर्ष के रूप में भारत देश की जैन समाज मनाने जा रही है,वर्तमान युग के आचार्य श्रेष्ठ विद्यासागर जी महाराज के संयम स्वर्ण महोत्सव वर्ष के उपलक्ष्य में देश के कई शहरों में आचार्यश्री के कीर्ति स्तम्भ भी स्थापित किये जा रहे हैं । परम पूज्य आचार्यश्री इस युग के ऐसे आचार्य हैं जिन्होंने श्रुत ज्ञान को आधार बनाकर अपने अनुभव चिंतन से मिश्रित दुर्लभ तत्व प्ररूपणा की है ।आचार्यश्री के संयममय पचास वर्ष की चर्या जहाँ विशिष्टता लिए हुए है वहीं पर श्रुत अभ्यास के साथ बिताये हुए पचास वर्ष तत्व रसिकों के लिए नई -नई चिंतन की धारा प्राप्त हुई है,आचार्यश्री ने श्रुत की आराधना,ज्ञान व परमात्मा की आराधना इस प्रकार की है कि जिस प्रकार ज्ञान आत्मा का स्वभाव है।उनका संयमोत्सव वर्ष मनाने के लिए सम्पूर्ण भारत वर्ष का जैन समुदाय उत्साहित है ।
युवा अवस्था में लिया ब्रह्मचर्यव्रत:-
आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज का जन्म 10अक्टूबर 1946को शरद पूर्णिमा के दिन कर्नाटक प्रांत के बेलगांव जिले के सदलगा ग्राम में हुआ था,उनके पिता मल्लपा व माँ श्रीमती ने उनका नाम विद्याधर रखा था,व उनके वचपन का नाम पीलू था,उन्होंने कन्नड भाषा में हाईस्कूल तक अध्ययन करने के पश्चात विद्याधर ने सन् 1967 में आचार्य देशभूषण जी महाराज से व्रह्मचर्य व्रत ले लिया,इसके बाद जो कठिन साधना का दौर शुरू हुआ तो आचार्यश्री ने कभी पीछे मुडकर नहीं देखा उनके तपोबल की आभा में हर वस्तु उनके चरणों में समर्पित होती चली गई ।
विद्याधर ऐसे बने विद्या के सागर:-
कठिन साधना का मार्ग पार करते हुए आचार्य श्री ने महज 22 वर्ष की उम्र में 30जून 1968 को राजस्थान के अजमेर में आचार्य ज्ञानसागरजी महाराज से मुनिदीक्षा ली,गुरूवर ने उन्हें विद्याधर से मुनि विद्यासागर बनाया,22नवम्बर 1972 को अजमेर में ही गुरुवर ने उन्हें आचार्य पद की उपाधि देकर उन्हें विद्यासागर से आचार्य विद्यासागर बना दिया ।
कई भाषाओं में हैं पारंगत:-
आचार्य पद की उपाधि मिलने के बाद आचार्य विद्यासागर महाराज ने देशभर में पदयात्रा की,चातुर्मास,गजरथ महोत्सव के माध्यम से अहिंसा व सदभाव का संदेश लोगों को दिया ।समाज को नई दिशा दी,आचार्यश्री संस्कृत व प्राकृत भाषा के,साथ हिंदी, मराठी, कन्नड़ भाषा का भी विशेषज्ञान रखते हैं, उन्होंनें हिंदी व संस्कृत में कई रचनाऐं भी लिखी हैं,इतना ही नहीं पीएचडी व मास्टर डिग्री के कई शोधकर्ताओं ने उनके कार्य में निरंजना शतक,भावना शतक,परीसह जय शतक,सुनीति शतक आदि महान रचनाओं पर शोधकर्ताओं ने शोध कार्य किऐं है। आचार्यश्री के मूकमाटी महाकाव्य पर 50 से अधिक लोग पीएचडी कर चुके हैं, जो एक रिकॉर्ड तो है ही, ऐतिहासिक और अदभुत और गौरवमयी है। यह महाकाव्य स्कूली पाठ्यक्रम में भी जगह बना चुका है, जो इसकी उपयोगिता दर्शाता है।
आचार्य श्री को बुंदेलखंड लगता है सबसे अच्छा:-आचार्यश्री को बुंदेलखंड सबसे अच्छा लगता है, उनके सबसे ज्यादा चातुर्मास व शीतकालीन व ग्रीष्मकालीन वाचनाऐं बुंदेलखंड में ही हुई हैं,उन्हें यहाँ का सोला या शोधन विधि (आहार चर्या)की सबसे अच्छी शुद्धि लगी है इस कारण आचार्यश्री को बुंदेलखंड सबसे ज्यादा अच्छा लगा है।
पंचम काल का आश्चर्य: वर्तमान समय में आचार्यश्री का संघ सम्पूर्ण देश का सबसे बड़ा दिगम्बर जैन साधु संघ है, जो अपने आपमें एक रिकॉर्ड है। सबसे बड़ी बात है कि संघ में संघ के नाम का कोई वाहन आदि नजर नहीं आता । टेलीविजन, मोबाइल, लेपटॉप आदि आधुनिक समान किसी भी साधु के कमरे में नहीं दिखते। संघ में सभी संत, साधु शिक्षित, संस्कारी और विवेकशील हैं तथा सभी बाल ब्रम्हचारी हैं। सभी धर्म चर्चा में ही अपना समय लगाते हैं।विहार के समय भक्तगण बड़ी संख्या में मार्ग में चौका लगाकर आहारदान देते हैं और पुण्य लाभ लेकर साथ साथ चलते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि इनके संघ में संघपति की तो बात दूर है कोई भी निजी चौका लेकर साथ नहीं चलता है। जहाँ-जहाँ संघ का प्रवास होता है, वहाँ वहाँ सैकड़ों की संख्या में लोग चौका लगाने उमड़ पड़ते हैं।इस समय 'नमोस्तु-नमोस्तु-नमोस्तु' की ध्वनि सुनते ही बनती है। हजारों की जनमेदनी इसे देखने उमड़ पड़ती है। आचार्यश्री के संघ में सामयिक, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय आदि सभी क्रियाओं का समय निर्धारित है। सभी समय से सारी क्रियाएं संपादित करते हैं। चाहे कितनी ही तेज गर्मी हो या कितनी की कड़कड़ाती ठंड, संघ के किसी साधु के कमरे में कूलर, एसी, हीटर देखने नहीं मिल मिलते। पंखे का उपयोग भी नहीं करते न ही मच्छर भगाने वाले किसी ऑयल या कोल का उपयोग करते, धन्य है ऐसी साधना। आर्यिकाएँ एकाकी विहार नहीं करती। किसी तरह के मंत्र, तंत्र, तावीज आदि की क्रियाओं से आचार्यश्री का संघ अछूता है। पूरा संघ एक ही आचार्य के अनुशासन में चलता है। संघ में दीक्षा गहन स्वाध्याय आदि के बाद दी जाती है। ताकि श्रमणाचार का वे निर्दोष पालन कर सकें। संघ के साधुगण प्रवचन-पटुता, काव्य रचना और ग्रंथ लेखन में निष्णात हैं।आचार्यश्री स्वयं बाल ब्रह्मचारी हैं तथा उनका पूरा संघ भी बाल ब्रम्हचारी है, जो इस पंचमकाल में किसी आश्चर्य से कम नहीं है।सही मायनों में तो अतिथि आचार्यश्री ही हैं। किसी को पता नहीं होता कि आचार्यश्री का पग विहार किस ओर होगा। सभी बस अपना अपना गणित लगाते हैं। जहां इनके चरण पड़ जाते हैं, वह धन्य हो जाते हैं, पूरा शहर क्या जैन, क्या अजैन सभी उनकी अगवानी के लिए उमड़ पड़ते हैं। आचार्यश्री को पाकर ऐसा लगता है कि न जाने कितने जन्मों का पुण्य आज फलित हो रहा है। आचार्यश्री चलते फिरते तीर्थ हैं और लगते हैं महावीर के लघुनंदन।उनके तेजस्वी और स्मित मुस्कान को देखकर हजारों लोगों के दुःख दूर हो जाते हैं। आचार्यश्री के जो भी दर्शन करता है वह धन्य हो जाता है। उनकी दिव्य देशना में जो अमृतवाणी झरती है उसे पान कर हजारों लोगों की प्यास बुझती है। आचार्यश्री की हर चर्या अतिशय-सा दिखती है। उनकी मंगल वाणी ख़िरते समय जो शांति का साम्राज्य रहता है वह देखने योग्य होता है। चारों ओर एक अजीव-सा सन्नाटा, मात्र आचार्यश्री की वाणी अनुगूँज सुनायी देती है बस। सचमुच अदभुत और निराले संत हैं पूज्य आचार्यश्री।
हम सभी का परम सौभाग्य है, जो ऐसे महान आचार्यश्री के समय में जन्म लिया-
इस युग का सौभाग्य रहा,
कि इस युग में गुरूवर जन्मे।
अपना यह सौभाग्य रहा,
गुरूवर के युग में हम जन्में।।
करुणा,समता, अनेकान्त का जीवंत दस्तावेज: पूज्य आचार्यश्री के उपदेश, हमेशा जीवन-समस्याओं संदर्भों की गहनतम गुत्थियों के मर्म का संस्पर्श करते हैं, जीवन को उसकी समग्रता में जानने और समझने की कला से परिचित कराते हैं। उनके साधनामय, तेजस्वी जीवन को शब्दों की परिधि में बांधना संभव नहीं है। हां, उसमें अवगाहन करने की कोमल अनुभूतियाँ अवश्य शब्दातीत हैं। उनका चिंतन फलक देश, काल, जाति, संप्रदाय, धर्म सबसे दूर, प्राणिमात्र को समाहित करता है, नैतिक जीवन की प्रेरणा देता है। उनका प्रखर तेजोमय व्यक्तित्व, जो बन गया है करुणा, समता और अनेकान्त का एक जीवंत दस्तावेज।
जैन जगत के जाने-माने मनीषी नरेंद्रप्रकाश जी प्राचार्य की यह पंक्तियां आचार्यश्री के बेमिशाल व्यक्तित्व को दर्शाती हैं-
रत्नत्रय से पावन जिनका,
यह औदारिक तन है।
गुप्ति-समिति -अनुप्रेक्षा में रत,
रहता निशदिन मन है।।
सन्मति-युग के ऋषि-सा जिसका,
बीत रहा हर क्षण है।
त्याग-तपस्या-लीन यति यह,
प्रवचनकला-प्रवण हैं।।
जिसकी हितकर वाणी सुनकर,
सबका चित्त मगन है।
जिसका पावन दर्शन पाकर,
शीतल हुई तपन है।।
तत्त्वों का होता नित चिंतन,
मंथन और मनन है।
विद्या के उस सागर को मम,
शत्-शत् बार नमन है।।
युगों-युगों तक करें हमारा मार्गदर्शन: आचार्य श्री जी के त्याग व तपोबल के कारण सारी दुनियाँ उनके आगे नतमस्तक है तपोमार्ग पर उनके पचासवें वर्ष पर प्रवेश का साक्षी बनने के लिए हर कोई आतुर है।वह स्वर्णिम अवसर कब आये इसकी आकांक्षा सम्पूर्ण भारत वर्ष का जैन समुदाय कर रहा है।
पूज्य आचार्यश्री के संदेश युगों-युगों तक सम्पूर्ण मानवता का मार्गदर्शन करें, हमारी प्रमाद-मूर्छा को तोड़ें, हमें अंधकार से दूर प्रकाश के उत्स के बीच जाने का मार्ग बताते रहें, हमारी जड़ता की इति कर हमें गतिशील बनाएं, सभ्य, शालीन एवं सुसंस्कृत बनाते रहें, यही हमारे मंगलभाव हैं, हमारी प्रार्थना है।आचार्यश्री और उनका संघ इस युग में अदभुत है, अकल्पनीय है और अविस्मरणीय तथा अविश्वसनीय है। ऐसे महान संत के पावन चरणों में कोटिशः प्रणाम!
कलयुग में भी यह सतयुग,
गुरूवर के नाम से जाना जावेगा।
कभी महावीर की श्रेणी में,
गुरूवर का नंबर आयेगा।।
जब तक सृष्टि के अधरों पर,
करुणा का पैगाम रहेगा।
तब तक युग की हर धड़कन में,
विद्यासागर जी का नाम रहेगा।।

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