08.04.2018 ►Acharya Shri VidyaSagar Ji Maharaj ke bhakt ►News

Posted: 08.04.2018

News in Hindi

धर्म केवल मन्दिर में नहीं, मूक प्राणियों के ऊपर दया, करुणा भाव करना भी धर्म है।- #आचार्यश्री #विद्यासागर जी महामुनिराज

#श्रमदान......महाकवि पंडित भूरामल सामाजिक सहकार न्यास​​ के ​​​हथकरघा प्रकल्प का नया रूप​​​
श्रमदान के _आधुनिक हथकरघा प्रशिक्षण केन्द्रों_ में _नि:शुल्क प्रशिक्षण_ के साथ एक मानदेय भी दिया जाता है और साथ ही जलपान आदि की व्यवस्था भी होती है ।
यह जानकारी हमे श्री गौरव जी उमाठे ने प्रदान की है, उनका धन्यवाद
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Acharya Shri Vidyasagar Ji maharaj ke Bhakt
Jainism and its De facto followers who believes into Rational Perception, Rational Knowledge and Rational Conduct (united)

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जानिए आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज के त्याग के बारे में, वास्तव में इस पंचम काल में चरित्र चक्रवर्ती आचार्य श्री शांति सागर जी के बाद पूर्णतया आगम अनुरूप चर्या देखना है तो वो है आचार्य श्री विद्या सागर जी महाराज उनके त्याग तपस्या चर्या इस प्रकार है -

• आजीवन चीनी का त्याग ।
• आजीवन नमक का त्याग ।
• आजीवन चटाई का त्याग ।
• आजीवन हरी का त्याग ।
• आजीवन दही का त्याग ।
• सूखे मेवा (Dry Fruits) का त्याग ।
• आजीवन तेल का त्याग ।
• सभी प्रकार के भौतिक साधनो का त्याग ।
• थूकने का त्याग ।
• एक करवट में शयन ।
• पूरे भारत में सबसे ज्यादा दीक्षा देने वाले ।
• पूरे भारत में एक मात्र ऐसा संघ जो बाल ब्रह्मचारी है ।
• पुरे भारत में एक ऐसे आचार्य जिनका लगभग पूरा परिवार ही संयम के साथ मोक्षमार्ग पर चल रहा है ।
• शहर से दूर खुले मैदानों में नदी के किनारो पर या पहाड़ो पर अपनी साधना करना ।
अनियत विहारी यानि बिना बताये विहार करना ।
• प्रचार प्रसार से दूर- मुनि दीक्षाएं, पीछी परिवर्तन इसका उदाहरण ।

आचार्य देशभूषण जी महराज से जब ब्रह्मचारी व्रत के लिए जब स्वीकृति नहीं मिली तो गुरुवर ने व्रत के लिए 3 दिवस निर्जला उपवास किया और स्वीकृति लेकर माने। ब्रह्मचारी अवस्था में भी परिवार जनो से चर्चा करके अपने गुरु से स्वीकृति लेते थे और परिजनों को पहले अपने गुरु के पास स्वीकृति लेने भेजते थे। आचार्य भगवंत सम दूसरा कोई संत नज़र नहीं आता जो न केवल मानव समाज के उत्थान के लिए इतने दूर की सोचते है वरन मूक प्राणियों के लिए भी उनके करुण ह्रदय में उतना ही स्थान है। शरीर का तेज ऐसा जिसके आगे सूरज का तेज भी फिका और कान्ति में चाँद भी फीका है।

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