12.06.2018 ►STGJG Udaipur ►News

Posted: 12.06.2018
Updated on: 13.06.2018

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सप्तव्यसन क्या हैं?

अति अन्याय रूप कार्य के बार-बार करने की प्रवृत्ति को व्यसन कहते हैं। ये व्यसन सात प्रकार के होते हैं—
जुआ खेलना, मांस, मद, वेश्यागमन, शिकार।
चोरी, पररमणी रमण, सातों व्यसन निवार।।
अर्थात् १. जुआ खेलना, २. मांस खाना, ३. शराब पीना, ४. वेश्यासेवन करना, ५. शिकार खेलना, ६. चोरी करना, ७. परस्त्री सेवन करना। इन सात प्रकारों से मानव पाप मार्ग में प्रवृत्ति करता है उसके फलस्वरूप नरकगति के दुःख भोगता है। यहाँ पर क्रम-क्रम से एक-एक व्यसन का वर्णन किया जा रहा है। इन्हें पढ़कर निव्र्यसनी प्राणी दूसरों को प्रेरित कर व्यसन का त्याग करावें तथा अंश मात्र भी जिनमें कोई व्यसन हैं वे उन्हें छोड़ने का सतत् प्रयास कर सद्गति के पात्र बनें—

जुआ व्यसन धर्म एवं सामाजिक प्रतिष्ठा को भी भंग कर देता है तो भी जुआरी को तृप्ति नहीं होती है। इस व्यसन के कारण भीषण कष्ट उठाने वाले पांडवों का कथानक कौन नहीं जानता? उनका ही उदाहरण यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है—
इतिहास कौरव पांडवों का
ऐतिहासिक नगरी हस्तिनापुर का कथानक है। जब यहाँ कुरुवंश के राजा राज्य कर रहे थे, उनका नाम था ‘‘धृत’’। इस न्यायप्रिय राजा के अम्बा, बालिका तथा अम्बिका नाम की तीन रानियाँ थीं । समयानुसार सांसारिक सुखों को भोगते हुए रानी अम्बा ने धृतराष्ट्र को, बालिका ने पांडु को और अम्बिका ने विदुर नामक पुत्र को जन्म दिया।
सभी पुत्रों ने कुमारकाल प्राप्त कर विवाह बन्धन स्वीकार किया। तदनुरूप धृतराष्ट्र की स्त्री का नाम गान्धारी था तथा पांडु के दो स्त्रियाँ थीं कुन्ती और माद्री। इनमें से धृतराष्ट्र के दुर्योधन आदि सौ पुत्र हुए और पांडु की कुन्ती नामक पत्नी से युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन तथा माद्री से नकुल-सहदेव ये दो पुत्ररत्न उत्पन्न हुए। कुन्ती की कन्या अवस्था में ही किसी कारण विशेष से पांडु के साथ संसर्ग होने से कर्ण नामक पुत्र का प्रसव पहले ही हो चुका था।
एक बार महाराज ‘‘धृत’’ को शरदऋतु में बादलों को नष्ट होते देखकर संसार से वैराग्य हो गया अतः बड़े पुत्र ‘‘धृतराष्ट्र’’ को हस्तिनापुर का राज्यभार सौंपकर पांडु को युवराज बनाकर जिनदीक्षा ग्रहण कर ली। उनके साथ ही छोटे भाई विदुर ने भी दीक्षा ले ली। काफी दिनों तक तपस्या करने के बाद धृत मुनि ने तो केवलज्ञान प्राप्त कर निर्वाण सुख भोगा और विदुर मुनिराज धर्मोपदेश करते हुए देश-देश में विहार करने लगे।
इसी प्रकार धृतराष्ट्र और पांडु को भी एक दिन वैराग्य का निमित्त मिला। उन्होंने एक भ्रमर को कमल के भीतर मरा हुए देखकर संसार की क्षणभंगुरता का विचार किया और राज्य को दो भागों में विभक्त कर युधिष्ठिर तथा दुर्योधन को उनका स्वामी बनाकर जैनेश्वरी दीक्षा स्वीकार कर ली।
पांडव लोग कुशलतापूर्वक अपने राज्य संचालन में लगे थे, लेकिन कपटी दुर्योधन ने अपना षड्यंत्र रचना प्रारम्भ कर दिया। एक दिन उसने पांचों पांडव भाइयों को अपने यहाँ आमंत्रित किया और उनका यथोचित आदर सत्कार किया। कुछ क्षण पश्चात् उसने धर्मात्मा युधिष्ठिर से स्नेहपूर्वक कहा—आइए, मनोरंजन के लिए थोड़ी देर द्यूत क्रीड़ा की जाए। युधिष्ठिर सरलचित्त थे, वे दुर्योधन के कपट को समझ न पाए अतः जुआ खेलने को राजी हो गए।
द्यूतक्रीड़ा प्रारम्भ हुई, दोनों ओर से पासे फेंके जाने लगे। सभी पासे कौरवों के अनुकूल पड़ने लगे। युधिष्ठिर की हार होती देखकर भीम ने एक क्रूर दृष्टि पासों पर डाली अतः अब पासे युधिष्ठिर के अनुकूल पड़ने लगे लेकिन दुर्योधन ने पुनः छल से भीम को किसी कार्यवश अन्यत्र भेज दिया तब कौरव फिर विजयी होने लगे। भाग्य का खेल देखो! भीम के वापस आने तक युधिष्ठिर उस जुए में अपना राजपाट सभी हार चुके थे। जब तक भीम उन्हें जुए की निकृष्टता के बारे में समझा ही रहे थे कि तब तक युधिष्ठिर ने अपना पूरा राज्य दांव पर लगा दिया और दुर्योधन द्वारा पराजित होकर विषण्णवदन अपने महल में लौट आए।
दुर्योधन को तो अब मुंहमांगी मुराद ही मिल गई थी। पांडव महल में पहुंचे ही थे कि दुर्योधन का दूत सन्देश लेकर पहुंच गया और युधिष्ठिर से कहने लगा—
‘‘महाराज दुर्योधन ने कहलाया है कि जब आप लोग बारह वर्ष का राज्य तथा समस्त ऐश्वर्य सहित अपने आपको भी हार गए हैं तो अब आपको इस राज्य में रहना उचित नहीं है। शर्त के अनुसार आप लोगों को राज्य से बाहर जाना होगा और छद्म वेश में रहना होगा ताकि कोई पहचान न पावे, यदि किसी ने आपको पहचान लिया तो पुनः बारह वर्ष का वनवास करना होगा। आज ही रात्रि में यहाँ से आप सब प्रस्थान कर जावें यही श्रेयस्कर है।’’
दूत को विदाकर पांडव अपने वनवास की योजना बना ही रहे थे कि अकस्मात् वहाँ दुःशासन आया और द्रौपदी को बलपूर्वक बाहर निकालने लगा। जब द्रौपदी ने कुछ आनाकानी की तो दुष्ट उसके केशों को अपनी मुट्ठी से पकड़कर महल से बाहर ले आया। द्रौपदी की इस दयनीय स्थिति को देखकर भीष्म पितामह ने दुःशासन को बहुत बुरा कहा लेकिन इन दुष्टों के ऊपर भला क्या प्रभाव पड़ने वाला था।
करुण विलाप करती हुई द्रौपदी पांडवों के पास पहुंची और उन लोगों की भत्र्सना करती हुई कहने लगी कि यदि आप लोग सचमुच में वीर पुरुष हैं तो दुर्योधन से मेरे अपमान का बदला क्यों नहीं लेते? तब भीम और अर्जुन के हृदय में कौरवों को जड़मूल से नष्ट कर देने का पौरुष जागृत हुआ किन्तु युधिष्ठिर ने सबको शान्त करते हुए कहा—यह समय युद्ध का नहीं है। इस समय तो हम वचनबद्ध हैं अतः अनुकूल समय आने पर बदला अवश्य लिया जाएगा। अभी तो वनगमन ही हमारा मुख्य लक्ष्य होना चाहिए। इस प्रकार ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर की आज्ञा सुनकर सभी लोग शान्त हो गए।
वृद्धा माता कुन्ती को विदुर के घर छोड़कर पांचों भाई वन के लिए गमन कर गए। द्रौपदी की जिद के कारण उसे भी साथ में ले जाना पड़ा। अनेकों वन, उपवन, पर्वत, झरने आदि को पार करते हुए पैदल ही यात्रा चल रही थी, वे जहाँ भी थक जाते तो वन में ही विश्राम करते एवं फल-फूल खाकर पेट भरते थे।
दीर्घकाल तक वनवास के कष्ट सहन करने के पश्चात् पांडवों ने युद्ध करके कौरवों पर विजय प्राप्त की, अन्त में दिगम्बर मुनि बनकर शत्रुंजय गिरि पर्वत पर तपस्या करके युधिष्ठिर-भीम-अर्जुन ने निर्वाण पद प्राप्त किया और नकुल सहदेव ने सर्वार्थसिद्धि का अहमिन्द्र पद प्राप्त किया।
पांडवों ने अपने जीवन में एक जुआ व्यसन के कारण वनवास जैसे कष्ट सहे तथा लोकापवाद हुआ इसलिए आज तक उनका उदाहरण जुआ खेलने वालों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है अतः विज्ञ पुरुषों को यह व्यसन दूर से ही छोड़ देना चाहिए।
इस भौतिकवादी युग में भी शेयर बाजार, लाटरी, सट्टेबाजी के कार्यों में अनेक महानुभाव लिप्त देखे जा रहे हैं। ये व्यापार भी जुआ व्यसन के अन्तर्गत ही आते हैं। भारी लाभ की आशा से मानव अपने व्यापार धन्धे को छोड़कर तेजी से शेयर बाजार की ओर भाग रहा है किन्तु भाग्य साथ न देने पर न जाने कितने युधिष्ठिर लुट रहे हैं और जीवन के मध्यम आनंद को भी तिलांजलि देकर उन्हें दर-दर का भिखारी बनना पड़ता है। व्यसन की ओर से मुख मोड़कर, बिना परिश्रम के करोड़पति, उद्योगपति बनने के सपने छोड़कर व्यापार करने वाले मध्यमवर्गीय परिवार आज भी मानसिक दृष्टि से अधिक सुखी देखे जा रहे हैं।
अतएव जुए से होने वाली हानियों की ओर दृष्टि डालते हुए आप सभी को उसके त्याग का संकल्प अवश्य लेना चाहिए।
कहते हैं ना,देर आए पर दुरुस्त
कई बार व्यक्ति रातों -रातों रात सफल
होना चाहता है वह कई गलत तरीके
अपनाता है । और सफल भी हो जाता है परन्तु वह सफलता टिकती नहीं क्योंकि खोखले कमजोर साधन मजबूती कैसे दे सकते है ।
फिर शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है।मन में किसी तरह का द्वेष किसी का अहित करने की भावना या किसी का अहित होने का भाव भी हमारी सफलता में बहुत बड़ी बाधा होता है। अक्सर लोग मानते हैं की जितने भी बड़े सफल व्यक्ति हैं।उनकी सफलता के पीछे छल -कपट की बड़ी भूमिका होती है परन्तु यह बहुत ही गलत सोच ह। अपने मन के खोट हम सवयं से तो छिपा लेतें हैं परन्तु उस सर्वशक्तिमान को सब ज्ञात होता है।मनचाही सफलता का स्वाद चखने के लिए मेहनत इच्छाशक्ति जितनी अवयशक है।उतना ही जीवन का दूसरा पहलू सीधा –सच्चा सरल रास्ता निर्मलता निर्द्वेश्ता भी अवयकश है।

सात व्यसनों में दूसरे नम्बर का व्यसन है—मांसाहार। यह जहां नैतिकता एवं आध्यात्मिकता का पतन करता है वहीं मानव के अन्दर निर्दयता को पनपाकर उसे पशु से भी निम्न श्रेणी में पहुंचा देता है। मांसाहार से मस्तिष्क की सहनशीलता नष्ट होकर वासना व उत्तेजना वाली प्रवृत्ति बढ़ती है। जब किसी बालक को शुरू से ही मांसाहार कराया जाता है तब वह अपने स्वार्थ के लिए दूसरे जीवों को मारने-कष्ट देने में कभी गलती का अहसास ही नहीं करता है जबकि मानव को स्वभावतः अहिंसक प्राणी माना गया है।
यूं तो प्राचीनकाल से ही शाकाहारी और मांसाहारी दोनों प्रकार के मनुष्य इस धरती पर हुए हैं किन्तु वर्तमान में मांसाहार का जो खुला और वीभत्स रूप हमारे देश में पनप रहा है इसे कलियुग का अभिशाप ही कहना होगा। भारतीय संस्कृति खोखली होकर अपने भाग्य पर आंसू बहाने को मजबूर हो गई है। जहां रक्षक ही भक्षक बना हुआ है अर्थात् सरकार स्वयं पशुओं का मांस निर्यात कर पाश्चात्य देशों की श्रेणी में अपना नाम दर्ज करा रही है तब मानवता भला किसके दरवाजे भीख मांगने जाएगी? वह कराह-कराह कर एक दिन पंगु हो जाएगी और मानव की शक्ल के पशु देश का राज्य संचालित कर अपनी स्वार्थपूर्ति करके धरती पर ही नरकों के दृश्य उपस्थित कर देंगे।
पुराण ग्रन्थ हमें बताते हैं कि यदि राजा भी मांसाहारी बन गया तो नीतिप्रिय जनता ने उसे राजिंसहासन से अपदस्थ कर जंगल का राजा बना दिया। एक लघु कथानक है—
श्रुतपुर नामक एक नगर में राजा बक राज्य करता था, वह मांसाहारी था, एक दिन उसके रसोइए को किसी कारणवश पशु का मांस न मिला तो उसने एक मरे हुए बालक का मांस पकाकर राजा को खिला दिया। राजा को वह मांस बड़ा स्वादिष्ट लगा अतः उसने रसोइये से प्रतिदिन मनुष्य का ही मांस तैयार करने को कहा। अब रसोइया गांव की गलियों में जाकर रोज बच्चों को मिठाई आदि का प्रलोभन देकर लाने लगा और राजा की भोजनपूर्ति करने लगा। इस तरह नगर में बच्चों की संख्या घटते देख जब पता लगाया तो राजा को जबरदस्ती जंगल में भगा दिया।
किन्तु जंगल में भी वह आते-जाते निरपराधी मनुष्यों को मार-मारकर खाने लगा और वह सचमुच में भेषधारी राक्षस ही बन गया था। गांव वालों ने पुनः इस पर विचार करके प्रतिदिन एक-एक मनुष्य को बक राक्षस के भोजन हेतु भेजना स्वीकार किया। फिर एक बार पांचों पांडव सहित माता कुन्ती वनवास के मध्य उस नगर में आए। वे लोग एक वैश्य के घर में ठहर गए, संध्या होते ही घर की स्त्री जोर-जोर से रोने लगी। कुन्ती के पूछने पर उसने सारा वृत्तान्त सुनाते हुए कहा कि कल प्रातः मेरा पुत्र उस राक्षस का भोजन बनकर जाएगा। अपने इकलौते पुत्र को मरने हेतु भेजने के नाम से ही मेरा कलेजा फटा जा रहा है।
एक माँ की करुण व्यथा कुन्ती को समझते देर न लगी और उसने उसे सांत्वना देते हुए कहा कि तुम्हारे पुत्र की जगह कल मेरा भीम उस राक्षस के पास जाएगा और उसे समाप्त कर समस्त ग्रामवासियों को भयमुक्त करेगा। पुनः कुन्ती ने भीम को सारी बात बताई और अगले दिन उसे बक राक्षस के पास भेज दिया। वहां पहुंचकर भीम ने अपने बाहुबल से राक्षस को समाप्त कर दिया तथा समस्त नगरवासियों के समक्ष वीरत्व दिखाया।
इस प्रकार से उस नरभक्षी राक्षस का आतंक नगर से दूर हो गया और वे लोग सुखपूर्वक रहने लगे। देखो! मांसाहार करने वाला राजा भी राक्षस बन गया एवं जिह्वालोलुपता के कारण उसे कितना दुःख, अपमान सहना पड़ा।
वर्तमान में मांसाहार आधुनिक फैशन का एक अंग-सा बन गया है अतः मांसाहारियों को दूसरों के सुख-दुख का कोई अनुभव ही नहीं होता है। प्रकृति ने हमें इतनी सारी सब्जियां, अनाज, फल, मेवा प्रदान किए हैं कि मांसाहार के लिए कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाती है फिर भी न जाने क्यों मानव मांसाहार की ओर बढ़ रहा है? मांसाहार के त्यागने में केवल मन के दृढ़ निश्चय की आवश्यकता है। इसको छोड़ने में कोई भी असुविधा नहीं होती है प्रत्युत् छोड़ने वालों को मानसिक शान्ति का ही अनुभव होता है। नित्यप्रति मांसाहार करने वालों ने भी एक क्षण के सत्संग से जीवन भर के लिए मांसाहार का त्याग किया है। इसके जीवन्त उदाहरण प्रत्यक्ष में देखे जाते हैं।
भारत की इस शस्यश्यामला भूमि के इतिहास को पढ़कर हृदय प्रसन्नता से फूला नहीं समाता परन्तु जब इस देश की वर्तमान दुर्दशा को देखते हैं तो दिल पीड़ा से व्यथित हो उठता है। —

सप्तव्यसन (मदिरापान)

सात व्यसनों में '''मदिरापान''' तृतीय व्यसन है जो कि प्रत्यक्ष में ही दुःख का कारण दिखाई देता है।
मदिरापान के व्यसनी न धर्म का साधन कर सकते हैं और न अर्थ का, वे अत्यन्त निर्लज्ज होकर केवल काम का सेवन ही अपना मुख्य कार्य समझते हैं। उन्हें माता और पत्नी का भी विवेक नहीं रहता है। शराबीजन मार्ग में बेहोश होकर गिर जाते हैं तथा कुत्ता उनके मुँह में पेशाब भी कर देता है किन्तु उन्हें कुछ भान नहीं रहता है। अधिक शराब पीने से कभी-कभी दुर्घटनाएँ भी घट जाती हैं जो निम्न पौराणिक कथानक से स्पष्ट हैं—
द्वारिकापुरी में राजकुमारों ने वनक्रीड़ा को जाते हुए अत्यधिक प्यास से पीड़ित होने पर पहाड़ की कन्दराओं में सड़ रही शराब को पानी समझ कर पी लिया। जिससे उन्मत्त होकर वे नाचते-गाते हुए नगर की ओर आ रहे थे कि मार्ग में द्वीपायन मुनि को देखकर उनके ऊपर पत्थरों और खोटे, अश्लील, भण्ड वचनों की वर्षा करने लगे। इससे उन तपस्वी मुनिराज को क्रोध आ गया अतः उनके बाएं कन्धे से तेजस पुतला निकल पड़ा और समस्त द्वारिका नगरी भस्म हो गई। सभी यादव उसमें जलकर मर गए।
देखो! मात्र एक शराब के व्यसन से इतना बड़ा अग्निकांड हो गया।
जो मनुष्य अपने को धार्मिकोन्नति के पथ पर लगाकर मोखसुख के प्राप्त होने की कामना रखता है उसे मद्य—मांसादि के परिहारपूर्वक अहिंसा धर्म का प्रतिपादन करने वाले जिनधर्म को स्वीकार कर आत्मकल्याण करना चाहिये।
इंग्लैण्ड के भूतपूर्व प्रधानमंत्री Glodstone ने शराब के बारे में कहा है—युद्ध, अकाल और प्लेग की तीनों इकट्ठी महा-आपत्तियाँ भी इतनी बाधा नहीं पहुँचा सकतीं, जितनी अकेली शराब पहूँचाती है।
जैन सिद्धान्त के अनुसार शराब की एक बूँद में असंख्य जीव पाए जाते हैं और उसको पीने से मनुष्य हेयोपादेय के विवेक से शून्य हो जाता है जिससे उसके दोनों लोक भ्रष्ट हो जाते हैं
एक लघु कथानक यहाँ प्रस्तुत है—
एकचक्र नाम के नगर में विष्णु के चरण कमलों की सेवा करने के लिए भ्रमर के समान रत वेद—वेदांग का पारगामी एकपाद नाम का सन्यासी रहता था। एक दिन उस सन्यासी के मन में सम्पूर्ण पापों को नाश करने वाली गंगा में स्नान करने की इच्छा उत्पन्न हुई इसलिए वह गंगा स्नान करने के लिए अपने नगर से बाहर निकला। मार्ग में एक भयानक गहन अटवी पड़ी, उसी अटवी में भीलों का एक बड़ा भारी झुण्ड यौनमद के साथ शराब पीकर मस्त हुई विलासिनी तरुणियों के साथ माँस और सुरा का सेवन कर रहा था। वह सन्यासी उस झुण्ड में जा फंसा, तब शराब के नशे में मस्त हुए भीलों ने उसे पकड़ लिया और उससे बोले—
तुझे मद्य, माँस और स्त्री में से किसी एक का सेवन करना होगा, नहीं तो तू जीते जी गंगा का दर्शन नहीं कर सकता।
यह सुनकर सन्यासी सोचने लगा कि स्मृतियों में एक तिल या सरसों बराबर भी माँस खाने पर बड़ी-बड़ी विपत्तियों का आना सुना जाता है। भीलनी के साथ सम्बन्ध करने पर प्रायश्चित लेना पड़ता है, जो मृत्यु का घर है किन्तु समस्त यज्ञों के सिरमौर सौत्रामणि नाम के यज्ञ में शराब पीने की अनुमति है और लिखा है कि जो इस विधि से मदिरापान करता है उसका मदिरापान करना पाप नहीं है तथा पीढ़ी, जल, गुड, धतूरा आदि जिन वस्तुओं से शराब बनती है वे भी शुद्ध ही होती हैं। इस सब बातों का चिरकाल तक मन में विचार कर उसने शराब पी लिया, उसके पीते ही मन चंचल हो उठा। नशे में मस्त होकर उसने अपनी लंगोटी खोल डाली और मदोन्मत्त भीलनियों के साथ तालियाँ बजा-बजाकर कूदने लगा। उस समय उसकी दशा ऐसी हो गई मानो उसके शरीर में कोई भूत घुस गया है। उसने अनेक विकृत चेष्टाएं की और फिर भूख से पीड़ित होकर माँस भी खा लिया, जिससे उसे असह्य कामोद्रेक उठा और उसने भीलनियों के साथ रति क्रिया की।
देखो! एकपाद सन्यासी ने सौत्रामणि नामक यज्ञ में मदिरापान को दोष नहीं बतलाया ऐसा समझकर मदिरापान किया जिससे दुर्गति को प्राप्त हुआ। एक व्यसन के कारण उसमें अन्य दो व्यसन स्वयमेव आ गये
तात्पर्य यह है कि पश्चिम देश का मानव भी यह अनुभव कर रहा है कि हम निज अस्तित्व को खोकर व्यसनी बन गए हैं इसीलिए सुख शान्ति हमसे दूर हो गई है, उसे प्राप्त करने हेतु जिनवाणी का स्वाध्याय एवं गुरुओं का सत्संग अत्यन्त आवश्यक है।

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#गुरु_पुष्कर रूप जैन विहार धाम
उदयपुर से#राणकपुर रोड पर श्रावक श्री चुन्नीलाल जी भोगर (जसवंतगढ- सुरत) के सौजन्य से #गुरु_पुष्कर रूप जैन विहार धाम का निर्माण हुआ।

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